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कश्मीर में आतंकवाद का पहला निशाना बनने वाले टीका लाल टपलू कौन थे? बलिदान दिवस पर फिर उठेगी ‘होमलैंड’ की मांग

Published: Sun, 13 Sep 2026 03:45 PM (IST)

टीका लाल टपलू, जो कश्मीर में आतंकवाद के पहले शिकार बने, उनकी पुण्यतिथि 14 सितंबर को 'बलिदान दिवस' के रूप में मनाई जाती है।

14 सितंबर को फिर उठेगी 'होमलैंड' की मांग।

14 सितंबर को फिर उठेगी 'होमलैंड' की मांग।

HighLights

  1. टीका लाल टपलू कश्मीर में आतंकवाद के पहले बड़े शिकार थे

  2. 14 सितंबर को उनकी पुण्यतिथि 'बलिदान दिवस' के रूप में मनाई जाती है

  3. विस्थापित कश्मीरी पंडित 'होमलैंड' और पुनर्वास की मांग फिर उठाएंगे

जम्मू-कश्मीर। कश्मीर की सियासत में कुछ तारीखें ऐसी हैं, जिन्हें सिर्फ कैलेंडर का हिस्सा नहीं माना जाता, बल्कि एक पूरे दौर के मोड़ के तौर पर याद किया जाता है। आज हम 14 सितंबर 1989 की एक ऐसी ही तारीख की बात करने जा रहे हैं जिसने कश्मीरी पंडितों की पूरी जिंदगी बदल दी।

इसी दिन कश्मीरी पंडित नेता और बीजेपी के वरिष्ठ नेता टीका लाल टपलू की आतंकियों ने हत्या कर दी थी। ये वही हत्याकांड है जिसे कश्मीर में बढ़ते आतंकवाद और कश्मीरी पंडितों के खिलाफ शुरू हुई हिंसा के शुरुआती बड़े घटनाक्रमों में गिना जाता है।

उनकी हत्या के बाद घाटी में डर का माहौल गहराता गया और आने वाले वर्षों में बड़ी संख्या में कश्मीरी पंडितों को अपना घर छोड़कर पलायन करना पड़ा। हर साल 14 सितंबर को कश्मीर में उनकी पुण्यतिथि के मौके पर 'बलिदान दिवस' मनाया जाता है।

अब उनकी पुण्यतिथि यानी बलिदान दिवस पर जम्मू में विस्थापित कश्मीरी हिंदू समुदाय एक बार फिर अपनी मांगों को लेकर आवाज बुलंद करने जा रहा है। इस दौरान ‘होमलैंड’, पुनर्वास, रोजगार और राहत पैकेज जैसे मुद्दे प्रमुख रहेंगे।

आइए जानते हैं कौन थे पंडित टीका लाल टपलू? साथ ही कश्मीरी पंडितों की वो मांगे जिन्हें लेकर वो बलिदान दिवस पर प्रदर्शन का ऐलान कर चुके हैं।

कौन थे पंडित टीका लाल टपलू?

टीका लाल टपलू कश्मीरी पंडित समुदाय के प्रमुख नेताओं में शामिल थे। पेशे से वकील टपलू श्रीनगर में जन्मे थे और शिक्षा पूरी करने के बाद जम्मू-कश्मीर लौटकर वकालत करने लगे। सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय रहते हुए वे कश्मीरी पंडित समुदाय की आवाज के तौर पर पहचाने जाने लगे।

टपलू का जुड़ाव राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से था और वह बीजेपी के शुरुआती नेताओं में भी शामिल रहे। जम्मू-कश्मीर में पार्टी के संगठन को मजबूत करने में उनकी भूमिका रही और वह प्रदेश बीजेपी के उपाध्यक्ष भी रहे।

आंदोलन से लेकर आपातकाल तक, कई बार गए जेल

टीका लाल टपलू सिर्फ राजनीतिक नेता ही नहीं थे, बल्कि आंदोलनों में सक्रिय भागीदारी के लिए भी जाने जाते थे। 1967 के आंदोलन और आपातकाल के दौरान उन्हें जेल भी जाना पड़ा। कश्मीर में कश्मीरी पंडितों से जुड़े मुद्दों को उठाने के कारण समुदाय के बीच उनकी पकड़ लगातार मजबूत होती गई।

उनकी सक्रियता और राजनीतिक विचारधारा ने उन्हें आतंकवाद के दौर में कट्टरपंथियों के निशाने पर ला दिया।

हत्या से दो दिन पहले भी हुआ था हमला

14 सितंबर 1989 से पहले भी टपलू को निशाना बनाने की कोशिश की गई थी। 12 सितंबर को उनके घर पर हमला हुआ, लेकिन वह उस हमले में बच गए। इसके महज दो दिन बाद आतंकियों ने उन्हें दोबारा निशाना बनाया।

14 सितंबर को जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट जाते समय आतंकियों ने उन पर हमला कर दिया। गोलीबारी में उनकी मौत हो गई। टपलू की हत्या ने कश्मीरी पंडित समुदाय के भीतर सुरक्षा को लेकर भय को और गहरा कर दिया। इसके बाद घाटी में आतंकवाद और लक्षित हत्याओं का दौर तेज होता गया।

बच्ची की मदद करने घर से निकले थे

टीका लाल टपलू की हत्या से जुड़ा एक प्रसंग आज भी कश्मीरी पंडित समुदाय में सुनाया जाता है। बताया जाता है कि हत्या के दिन उन्हें एक बच्ची के रोने की आवाज सुनाई दी। बच्ची की मां ने कथित तौर पर बताया कि उसकी बेटी के स्कूल में कार्यक्रम था, लेकिन उसके पास पैसे नहीं थे।

टपलू ने बच्ची की मदद के लिए अपनी जेब से पांच रुपये निकालकर उसे देने की कोशिश की। इसी दौरान आतंकियों ने उन पर गोलियां चला दीं। यह घटना टपलू की छवि को सिर्फ एक राजनीतिक नेता के रूप में नहीं, बल्कि जरूरतमंदों की मदद करने वाले व्यक्ति के तौर पर भी सामने रखती है।

टपलू की हत्या के बाद क्यों महत्वपूर्ण हो गया 14 सितंबर?

टीका लाल टपलू की हत्या कश्मीरी पंडितों के लिए एक गहरे जख्म की तरह दर्ज हो गई। आने वाले समय में घाटी में आतंकवादी हिंसा बढ़ी और कश्मीरी पंडितों के खिलाफ धमकियों और हमलों का सिलसिला तेज हुआ।

बड़ी संख्या में कश्मीरी पंडितों को घाटी छोड़कर जम्मू और देश के दूसरे हिस्सों में विस्थापित जीवन जीना पड़ा। इसी वजह से हर साल 14 सितंबर को टपलू की पुण्यतिथि को बलिदान दिवस के तौर पर याद किया जाता है।

बलिदान दिवस पर फिर उठेगी ‘होमलैंड’ की मांग

इस बार 14 सितंबर को जम्मू में विस्थापित कश्मीरी हिंदू समुदाय की ओर से बड़े कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है। पनुन कश्मीर के तहत पलोड़ा के मन्हास मैदान में होने वाले कार्यक्रम में समुदाय अपनी लंबित मांगों को केंद्र और जम्मू-कश्मीर प्रशासन के सामने रखने की तैयारी में है।

इन मांगों में कश्मीर में हिंदुओं के नरसंहार को सरकारी स्तर पर मान्यता देने, विस्थापित हिंदुओं के लिए अलग ‘होमलैंड’, 15 हजार युवाओं के लिए रोजगार पैकेज और मासिक नकद राहत राशि बढ़ाने जैसी मांगें शामिल हैं।

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