जम्मू, रोहित जंडियाल। कश्मीर अपनी सूफियाना संस्कृति के लिए विख्यात रहा है। कभी देश में सूफियत का गढ़ था जम्मू-कश्मीर। यहां हर कोई आपस में प्यार, भाईचारे और शांति के साथ रहता था, लेकिन अमन के दुश्मनों को यह रास नहीं आया। हमें अपने इन दुश्मनों को, इनकी चाल और इनके मकसद को समझने में अब कोई उलझन नहीं रह गई है। लिहाजा, कट्टरपंथ की आड़ में अपने मनसूबे पूरे करने में जुटे रहे इन दुश्मनों के बहकावे में कश्मीर की युवा पीढ़ी अब कभी नहीं आएगी। आइए, वादी-ए-कश्मीर को फिर से धरती का स्वर्ग बनाएं..।

अनुच्छेद 370 के निष्क्रिय किए जाने के बाद देश के विभिन्न भागों से कश्मीर पहुंचे सूफी संतों और मुस्लिम धर्म गुरुओंको कश्मीर के लोगों ने गंभीरतापूर्वक सुना और समझा। कश्मीर को पाकिस्तान पोषित कट्टरपंथ से मुक्ति दिलाने वाली इस बहुप्रतीक्षित पहल का जहां अलगाववादी तत्वों ने विरोध किया, वहीं कश्मीरी आवाम ने इसके मायने अच्छे से समङो। दरअसल, कश्मीर की वषों पुरानी सूफी संस्कृति को पुन: स्थापित करने के लिए कश्मीर को सूफी संस्कृति के केंद्र के रूप में विकसित करने पर जोर दिया जा रहा है।

अजमेर दरगाह के प्रमुख जैनल अबेदीन अली खान की पहल पर उनके बेटे नसीरुद्दीन चिश्ती कश्मीर में 17 सदस्यीय दल के साथ पहुंचे। उनके साथ जयपुर, अजमेर, झुनझनु, हैदराबाद, नई दिल्ली, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, गुजरात और बिहार के सूफी संत भी शामिल थे। इन संतों का मकसद कश्मीर को लेकर पाकिस्तान प्रायोजितदुष्प्रचार का माकूल जवाब देना और 370 निष्क्रिय होने के बाद कश्मीर की जमीनी हकीकत से रूबरू होना था। वे हजरतबल, मकदूम साहिब, सोनावर सहित कई मस्जिदों में गए और वहां नमाज अदा की। वह जीबी पंत अस्पताल में गए। लाल चौक व आसपास के क्षेत्रों में जाकर लोगों से मुलाकात की। कश्मीर के हालात पर लोगों से बात की। स्थानीय लोगों, व्यापारियों, विद्यार्थियों, टूर एंड ट्रेवल्स ऑपरेटरों सहित हर वर्ग से मिले।

इस्लाम के नाम पर युवाओं को गुमराह करने वालों को आगाह किया

ऑल इंडिया सूफी सज्जादानशीं काउंसिल के प्रमुख नसीरुद्दीन चिश्ती ने कहा, हमारे प्रतिनिधिमंडल ने कश्मीर में इस्लाम के नाम पर युवाओं को गुमराह करने वालों को आगाह किया। कुलमिलाकर, यह साफ है कि राज्य के तीन दिवसीय दौरे में सूफी संतों और मुस्लिम धर्म गुरुओं ने कश्मीर के स्थानीय लोगों को स्पष्टता के साथ यह बताने का प्रयास किया कि अलगाववादी और पाकिस्तान समर्थक निहित स्वार्थों के लिए लोगों को गुमराह कर रहे हैं। कुछ जगहों पर अलगाववादी समर्थकों का विरोध इन संतों को ङोलना पड़ा, जिससे साफ हो गया कि अलगाववादियों को इनका यहां आना कतई रास नहीं आया। बावजूद कश्मीर के लोग इन सूफी संतों से मिलने और उनके विचार सुनने को उत्सुक थे। ये संत अब कश्मीर के हालात पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह को अपनी रिपोर्ट सौंपेंगे। उनका प्रयास होगा कि प्रधानमंत्री से मिलकर कश्मीर के स्थानीय लोगों की जो शिकायतें हैं, उन्हें दूर किया जा सके।

कश्मीर को सूफी संस्कृति के केंद्र के रूप में विकसित करने पर दिया जोर

नई दिल्ली स्थित हजरत निजामुद्दीन औलिया दरगाह के ट्रस्टी और 2016 में दिल्ली में विश्व सूफी सम्मेलन के आयोजन से जुड़े सूफी अजमल निजामी मानते हैं कि कश्मीर में अमन की राह सूफीवाद ही दिखा सकता है। सूफी संगीत और विचारधारा रूह को भी बदल देगी। कश्मीर कभीसूफी संस्कृति का प्रमुख केंद्र था। बीते कुछ वर्षो में कट्टरपंथियों ने लोगों के दिमाग में जहर घोला। अब यह बदलाव का समय है। आज कट्टरवाद के जनक भी सूफीवाद की ओर देख रहे हैं। ऐसे में कट्टरपंथ पोषित आतंकवाद को सूफीवाद आईना दिखाने का बड़ा काम कर सकता है। कश्मीर सहित पूरी दुनिया में युवाओं की आस्था सूफी दर्शन की ओर बढ़ी है। मैं देश के सभी सूफी संतों से आह्वान करता हूं कि वे कश्मीरी युवाओं को नई राह दिखाएं।

युवाओं को कोचिंग देने में हर संभव मदद करेगा उनका संगठन

सूफी संतों ने कश्मीर में लोगों, विशेषकर युवाओं का दिल जीतने का पूरा प्रयास किया। उन्होंने कहा कि वे युवाओं के दर्द को समझते हैं। ढाई महीने से उनकी पढ़ाई का जो नुकसान हुआ है, उसकी भरपाई के लिए निश्शुल्क कोचिंग देने का प्रयास करेंगे। कश्मीरी युवा देश के जिस भाग में कोचिंग लेना चाहते हैं, उसकी सुविधा उपलब्ध करवाएंगे। उन्हें रोजगार दिलवाने के लिए कंपनियों के साथ बातचीत कर पूरा प्रयास करेंगे। सूफी संतों ने कश्मीर के लोगों को यह संदेश देने का प्रयास किया कि कश्मीर में इतना बड़ा बदलाव होने के बावजूद एक गोली नहीं चली। किसी की जान नहीं गई।

Posted By: Rahul Sharma

अब खबरों के साथ पायें जॉब अलर्ट, जोक्स, शायरी, रेडियो और अन्य सर्विस, डाउनलोड करें जागरण एप