यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Aug 20, 2023 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
कुलगाम हमले में शामिल आतंकियों को पकड़ने के लिए सर्च ऑपरेशन जारी, 5 अगस्त को बलिदान हुए थे तीन जवान
सुरक्षा बलों के एक शीर्ष अधिकारी ने कहा कि दक्षिण कश्मीर में तलाशी अभियान चल रहा है और कुलगाम हमले ...और पढ़ें

जम्मू, राज्य ब्यूरो। Kulgam Terror Attack इस महीने की शुरुआत में दक्षिण कश्मीर के कुलगाम जिले में घात लगाकर किए गए हमले में शामिल आतंकियों को पकड़ने के लिए तलाश जारी है। इस हमले में तीन सैनिक बलिदान हो गए थे। सुरक्षा अधिकारियों का कहना है कि इस वर्ष राजौरी और पुंछ में हुए हमलों के पीछे भी वही समूह था।
सुरक्षा बलों के एक शीर्ष अधिकारी ने कहा कि दक्षिण कश्मीर में तलाशी अभियान चल रहा है और हमले में शामिल आतंकियों का पता लगाने के लिए क्वाडकॉप्टर का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जा रहा है। हमारा आकलन है कि आतंकियों का समूह अभी भी दक्षिण कश्मीर में है और पीरपंजाल पर्वत श्रृंखला के दूसरी ओर नहीं गया है। हम समूह के पार जाने से पहले उनसे संपर्क की उम्मीद कर रहे हैं। यदि वे पार करने में सफल हो जाते हैं तो वे फिर कुछ अवधि के लिए चुप नीचे पड़े रहेंगे।
कुलगाम में बलिदान हुए थे तीन जवान
पांच अगस्त को कुलगाम के हलान वन क्षेत्र में आतंकियों ने सेना के तीन जवानों को बलिदान कर दिया था। वन क्षेत्र में आतंकियों की संभावित आवाजाही के बारे में संकेत मिलने के बाद सैनिकों ने घेराबंदी और तलाशी अभियान शुरू किया था। अप्रैल में पुंछ में कुल पांच सैनिक बलिदान हुए और मई में राजौरी के भट्टादुरियन में हुए हमले में पांच अन्य की जान चली गई।
'समूह में उच्च प्रशिक्षित विदेशी आतंकी शामिल'
इस साल की शुरुआत में राजौरी-पुंछ में हुए हमलों और हाल ही में कुलगाम में हुए हमलों के बीच काफी समानता है। अधिकारी ने कहा कि हमारा मानना है कि यह छह से आठ आतंकवादियों का एक समूह है जो पीर पंजाल पर्वत श्रृंखला के दोनों किनारों पर सक्रिय है।
उन्होंने कहा कि इस समूह में अधिकांश उच्च प्रशिक्षित विदेशी आतंकी शामिल हैं लेकिन उन्हें दो से तीन स्थानीय अलगाववादियों का समर्थन भी है। उनका काम करने का तरीका किसी के ध्यान में आए बिना चुपचाप झूठ बोलना और संभावित लक्ष्यों की टोह लेना है। एक बार जब वे हमला करते हैं तो समूह एक निश्चित अवधि के लिए चुप हो जाता है।
लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद का लिंक
यह समूह जिसे लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद के आतंकियों का मिश्रण माना जाता है, अब तक फोन जैसे संचार उपकरणों का उपयोग करने से बचकर रडार के नीचे रहने में कामयाब रहा है। वे फोन से सख्ती से परहेज कर रहे हैं। वे गांवों में नहीं जाते हैं। वे स्थानीय विवादों में हस्तक्षेप नहीं कर रहे हैं और ऐसा लगता है कि उन्हें जो भी जरूरत है उसके लिए भुगतान कर रहे हैं। यह मानव खुफिया संभावनाओं के साथ-साथ तकनीकी निगरानी दोनों को सीमित करता है।
अधिकारियों का कहना है कि ऐसा लगता है कि समूह को रसद ओवर ग्राउंड कार्यकर्ताओं का एक समर्पित और भरोसेमंद नेटवर्क प्रदान करता है। वरिष्ठ अधिकारी ने आगे कहा कि कुलगाम ऑपरेशन कुछ समय पहले उठाए गए आतंकवादी समूह के डिजिटल पदचिह्न पर आधारित था। चूंकि यह क्षेत्र जंगल के अंदर है। इसलिए एक छोटी टीम के साथ एक संचार केंद्र स्थापित किया गया जबकि बड़ी टीम आतंकियों की तलाश में निकल पड़ी। आतंकियों ने संचार केंद्र को निशाना बनाकर इसका फायदा उठाया। अधिकारी ने कहा कि आतंकी अब तक भाग्यशाली रहे हैं लेकिन हम उन्हें पकड़ लेंगे।
