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सर्जन हैं, मशीन भी... फिर भी बंद है RS पुरा अस्पताल में लैप्रो ऑपरेशन, निजी क्लिनिक जाने को मजबूर गरीब मरीज

Published: Tue, 29 Sep 2026 03:24 PM (IST)

आरएसपुरा उपजिला अस्पताल में लैप्रोस्कोपिक मशीन पुर्जों के अभाव में बंद पड़ी है, जिससे सर्जन होने के बावजूद ऑपरेशन नहीं ...और पढ़ें

कुछ पुर्जों के अभाव में मरीजों पर निजी अस्पताल का बोझ।

कुछ पुर्जों के अभाव में मरीजों पर निजी अस्पताल का बोझ।


HighLights

  1. आरएसपुरा अस्पताल में लैप्रोस्कोपिक मशीन पुर्जों की कमी से बंद

  2. गरीब मरीजों को निजी क्लीनिकों में महंगा इलाज कराना पड़ रहा

  3. अधिकारियों ने आवश्यक पुर्जों के लिए विभाग को लिखा है

दलजीत सिंह, आरएसपुरा। यह कैसी स्वास्थ्य व्यवस्था है, जहां ऑपरेशन करने वाला सर्जन मौजूद है, लैप्रोस्कोपी की मशीन भी अस्पताल में पड़ी है, लेकिन कुछ जरूरी पुर्जों के अभाव में मरीजों को ऑपरेशन की सुविधा नहीं मिल रही।

आरएसपुरा के उपजिला अस्पताल में लैप्रोस्कोपिक ऑपरेशन की सुविधा महज इसलिए अटकी हुई है क्योंकि मशीन के कुछ हिस्से उपलब्ध नहीं हैं और मशीन पूरी तरह स्थापित नहीं हो पाई है। बताया जा रहा है कि आवश्यक सामान उपलब्ध करवाने के लिए करीब 70 से 80 हजार रुपये की जरूरत है।

नतीजा यह है कि माइनर लैप्रो ऑपरेशन तक नहीं हो पा रहे हैं और मरीजों को मजबूरी में निजी क्लीनिकों का रुख करना पड़ रहा है, जहां उन्हें करीब 40 से 50 हजार रुपये तक खर्च करने पड़ रहे हैं।

लैप्रोस्कोपिक सर्जरी को सामान्य तौर पर छोटे चीरे के जरिए की जाने वाली न्यूनतम चीरा शल्य चिकित्सा माना जाता है। इसमें कैमरा और विशेष उपकरणों के माध्यम से ऑपरेशन किया जाता है। कई प्रक्रियाओं में इसके कारण बड़े चीरे वाली सर्जरी की तुलना में दर्द, अस्पताल में रहने की अवधि और स्वास्थ्य लाभ के समय में कमी हो सकती है।

मशीन है तो सुविधा क्यों नहीं?

स्थानीय लोगों का सवाल है कि जब अस्पताल में सर्जन उपलब्ध है और लैप्रोस्कोपी मशीन भी मौजूद है, तो मशीन को पूरी तरह चालू करने के लिए जरूरी पुर्जे उपलब्ध करवाने में इतनी देरी क्यों हो रही है। लोगों के अनुसार मामूली सामान की कमी के कारण सरकारी अस्पताल में उपलब्ध विशेषज्ञता और मशीन दोनों का लाभ मरीजों को नहीं मिल पा रहा है।

इसका सबसे अधिक असर उन मरीजों पर पड़ रहा है जो निजी अस्पतालों का खर्च वहन नहीं कर सकते। सरकारी अस्पताल में सुविधा मिलने की उम्मीद लेकर पहुंचने वाले मरीजों को ऑपरेशन के लिए निजी संस्थानों में भेजा जा रहा है, जहां उन्हें हजारों रुपये खर्च करने पड़ रहे हैं।

मेडिसिटी की मांग के बीच छोटी सुविधा भी अधूरी

एक ओर क्षेत्र के मौजूदा विधायक विधानसभा के इसी सत्र में आरएसपुरा के मीरां साहिब क्षेत्र में मेडिसिटी स्थापित करने की मांग उठा चुके हैं, वहीं दूसरी ओर स्थानीय सरकारी अस्पताल में मौजूद मशीन को कुछ पुर्जों के अभाव में शुरू नहीं किया जा रहा। ऐसे में स्थानीय लोगों का सवाल है कि बड़े स्वास्थ्य संस्थान की मांग के साथ-साथ मौजूदा अस्पताल में उपलब्ध सुविधाओं को चालू करवाने के लिए आवाज क्यों नहीं उठाई जा रही?

उपजिले में दो विधायक होने के बावजूद लोगों का कहना है कि यदि अस्पताल में लैप्रो ऑपरेशन शुरू करवाने के लिए केवल आवश्यक पुर्जों और करीब 70-80 हजार रुपये के सामान की जरूरत है तो इस मुद्दे को प्राथमिकता के आधार पर उठाकर इसका समाधान करवाया जाना चाहिए।

क्या स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी और क्षेत्र के जनप्रतिनिधि इस मामले को गंभीरता से ले रहे हैं, या फिर सरकारी अस्पताल की इस बदहाली का लाभ निजी क्लीनिकों को मिल रहा है? कहीं निजी क्लीनिकों के साथ किसी तरह की सांठगांठ के चलते तो सरकारी अस्पताल में उपलब्ध सुविधा को शुरू करने में लापरवाही नहीं बरती जा रही?

हालांकि, इस संबंध में किसी तरह की मिलीभगत का फिलहाल कोई प्रमाण सामने नहीं आया है, लेकिन मरीजों की जेब पर पड़ रहे आर्थिक बोझ और सरकारी सुविधा के बंद रहने के कारण इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग उठ रही है।

स्थानीय लोगों का कहना है कि स्वास्थ्य विभाग को स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए कि मशीन के कौन-से पुर्जे उपलब्ध नहीं हैं, उन्हें खरीदने की प्रक्रिया कहां तक पहुंची है और ऑपरेशन शुरू करने में आखिर कितनी देरी होगी। साथ ही, क्षेत्र के दोनों विधायकों को भी इस मुद्दे पर जवाबदेही तय करवाने के लिए आगे आना चाहिए।

विभाग को लिख चुके हैं : बीएमओ

ब्लॉक मेडिकल अधिकारी डॉ. बलविंद्र सिंह का कहना है कि लैप्रोस्कोपिक ऑपरेशन के लिए जरूरी सामान उपलब्ध करवाने को लेकर उन्होंने विभाग के अधिकारियों को लिखा है। सामान उपलब्ध होने और मशीन पूरी तरह स्थापित होने के बाद लैप्रो ऑपरेशन शुरू किए जा सकेंगे।

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