जम्मू, विकास अबरोल। जम्मू-कश्मीर को भले ही अनुच्छेद 370 की बेड़ियों से आजादी मिल चुकी है लेकिन प्रदेश के प्रतिभावान खिलाड़ी अभी भी खेल नीति नहीं होने की वजह से घुटन महसूस रहे हैं। यही वजह है कि जम्मू-कश्मीर का राज्य का दर्जा समाप्त हुए भी दो वर्ष से अधिक का समय बीत चुका है लेकिन अभी तक खिलाड़ियों को खेल नीति का इंतजार है।

हालांकि गत 26 नवंबर को प्रदेश के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने एक कार्यक्रम में साफतौर पर एक महीने के भीतर प्रदेश में नई खेल नीति घोषित करने का ऐलान किया था। आज तक 10 दिन का समय बीत चुका है और बचे हुए 20 दिनों में नई खेल नीति को लागू करना संभव नहीं दिख रहा है। यह कोई पहला मौका नहीं है जब प्रदेश में खेल नीति को लेकर बड़े-बड़े दावे किए गए हों। इससे पहले भी गत वर्ष खेल नीति बनाने को लेकर बड़े-बड़े बयान दिए गए थे लेकिन आज तक इन्हें पूरा नहीं किया गया। इसको लेकर प्रदेश के अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय खिलाड़ियों में काफी निराशा है। पूर्ववर्ती राज्य जम्मू-कश्मीर की पूर्व सरकारों ने भी खिलाड़ियों के भविष्य से खिलवाड़ करते हुए खेल नीति को लेकर कई बड़े ऐलान किए लेकिन आज तक खिलाड़ियों को नई खेल नीति नहीं मिली।

केंद्र सरकार प्राथमिकता के तौर पर प्रदेश में खिलाड़ियों की सुख सुविधा के लिए खेलों का बुनियादी ढांचा तैयार करने में जुटा है। इसके लिए प्रधानमंत्री पैकेज के अंतर्गत प्रदेश के जिला, तहसील और बलाक स्तर पर ज्यादातर खेल मैदान विकसित भी कर दिए गए हैं लेकिन जब तक इन मैदानों के रखरखाव और खिलाड़ियों को प्रशिक्षण देने के लिए कोच की नियुक्तियां नहीं होगी तब तक खिलाड़ियों का विकास होना संभव नहीं है। खिलाड़ी तमाम सुविधाओं के अभाव के बावजूद अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर पदक जीतकर प्रदेश के नाम को चार चांद लगा चुके हैं लेकिन खेल नीति की कमी कहीं न कहीं उनके विकास की राह में बाधा उत्पन्न कर रही है।

एसआरओ 349 के तहत हर वर्ष 25 पदक विजेता खिलाड़ियों को सरकारी नौकरी देने का प्रविधान है लेकिन वर्ष 2015 से लेकर आज तक खिलाड़ी अपना हक पाने के लिए दर-दर भटक रहे हैं। भले ही यह मामला अब कोर्ट में विचाराधीन है लेकिन खेलों से जुड़ी एजेंसियां और अधिकारी इस मामले में अधिक दिलचस्पी नहीं दिखा रहे हैं। इस वर्ष मार्च महीने में उपराज्यपाल ने एक कमेटी बनाकर खिलाड़ियों की भर्ती से जुड़े मामले के जल्द से जल्द निपटारे के आदेश भी दिए थे लेकिन स्थिति जस की तस बनी हुई है।

उपराज्यपाल मनोज सिन्हा से खिलाड़ियों को बहुत उम्मीदें, तय समय पर लागू होगी खेल नीति

स्कूल गेम्स फेडरेशन आफ इंडिया के वरिष्ठ उपप्रधान अशोक कुमार का मानना है कि उपराज्यपाल मनोज सिन्हा खिलाड़ियों के मसलों को लेकर काफी संजीदा हैं। अशोक कुमार ने कहा कि मैं मानता हूं कि अगर उपराज्यपाल ने एक महीने के भीतर नई खेल नीति लागू करने का ऐलान किया है तो ऐसा ही होगा। वर्ष 1966 में जम्मू-कश्मीर स्पोर्ट्स काउंसिल और वर्ष 1976 में युवा, सेवा एवं खेल विभाग का गठन हुआ। इन दोनों विभागों के पास कारगर नीति नहीं होने की वजह से पूर्व में कई प्रतिभाशाली खिलाड़ियों को बाहरी राज्यों व विदेशों का रुख करना पड़ा है।

अब सरकार के पास मौका भी है और दस्तूर भी है। अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय स्तरीय प्रतियोगिताओं के पदक विजेताओं व प्रतिभागिता वाले खिलाड़ियों को प्राथमिकता के आधार पर सरकारी नौकरियां देनी चाहिए। खिलाड़ियों के भविष्य को उज्ज्वल बनाने के लिए विभिन्न खेलों से जुड़े पूर्व प्रशिक्षकों, स्पोर्ट्स साइंस से जुड़े विशेषज्ञों की सेवाएं लेनी चाहिए ताकि प्रदेश के खिलाड़ी पहले की अपेक्षा अधिक संख्या में प्रदेश के लिए पदक जीत सकें। इसके लिए हरियाणा, पंजाब और उत्तर प्रदेश जैसी खेल नीति बनानी होगी तभी खेल और खिलाड़ियों का कल्याण संभव हो सकेगा।  

Edited By: Vikas Abrol