जम्मू, सुरेंद्र सिंह। बारह वर्ष के मासूम की अंगुली पकड़ कर पिता नटरंग नाट्य संस्था में बच्चों की कार्यशाला में लेकर आए तो शायद ही किसी ने उस समय सोचा होगा कि यह बच्चा अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त इस संस्था की रीढ़ की हड्डी बन जाएगा। लेखक पिता की इस संतान ने साबित कर दिया कि मेहनत और निष्ठा से कोई भी सफलता इंसान के कदम चूमती है। रियासी के छोटे से गांव कुंडर में जन्मा मोहम्मद यासीन आज रंगमंच में जाना-पहचाना नाम बन चुका है। लंदन में अंतरराष्ट्रीय थियेटर फेस्टिवल हो या फिर वर्ष 2018 में आयोजित थियेटर ओलंपिक्स और कॉमन वेल्थ गेम्स में डोगरी नाटक का मंचन, यासीन ने हर जगह अपनी छाप छोड़ी। बहुमुखी प्रतिभा के धनी यासीन जहां अभिनय से अपने किरदार की अमिट छाप छोड़ जाता है तो वहीं थियेटर से जुड़े तकनीक जैसे लाइट एंड साउंड से भी वह अपनी प्रतिभा दिखा जाता है।

रंगमंच का सफर: अपने रंगमंच के सफर के बारे में यासीन का कहना है कि उनके पिता ही उसे इस क्षेत्र में लेकर आए। उनके पिता अब्दुल कादिर कुंडरिया खुद डोगरी व उर्दू के लेखक हैं। पिता की लेखनी से प्रभावित मेरा झुकाव कला के क्षेत्र की ओर हुआ तो वर्ष 2001 में पिता उसे नटरंग में बच्चों की कार्यशाला में लेकर पहुंच गए। बस यहीं से मेरा थियेटर का सफर शुरू हो गया। बच्चों के नाटकों के साथ नटरंग के बड़े नाटकों में भी काम करने का मौका मिला। आज नटरंग के साथ बाबा जित्तो, महाभोज, घुमाई, आप हमार कौन हैं, मेरे हिस्से की धूप कहां है सहित सत्तर से ज्यादा नाटकों में अभिनय कर चुके हैं। जम्मू एंड कश्मीर फेस्टिवल लंदन व थियेटर ओलंपिक्स जैसे अंतरराष्ट्रीय महोत्सवों में भी भाग ले चुका हूं। पदमश्री बलवंत ठाकुर से अभिनय की बारीकियों का तो पता चला ही, इसके अलावा इस बात का भी पता चला कि किसी भी नाटक में लाइट एंड साउंड भी अपना अलग प्रभाव छोड़ती है।

मां के भांड पुकारने पर कश्मीर तक पहुंचा यासीन: यासीन ने कश्मीर की सात सौ साल पुरानी नाट्य शैली भांड पाथर पर भी रिसर्च किया। यासीन कहते हैं कि घर में जब कभी वह रिहर्सल कर रहे होते तो मां कभी मजाक में उसे भांड कह देती थी। उस समय वह छोटा था लेकिन मन में ख्याल आता था कि मां अगर उसे भांड कहती है तो भांड जरूर कोई बड़ा कलाकार होता होगा। बाद में उसे पता चला कि भांड कश्मीर की पुरानी नाट्य शैली है जो बिगड़े हुए परिवेश के कारण अपना स्वरूप खो रही है और कलाकार भी इससे मुंह मोड़ रहे हैं। वर्ष 2009 में उसे कश्मीरी नाटककार एवं पदमश्री मोती लाल का सानिध्य प्राप्त हुआ तो उसने भांड पाथर पर रिसर्च शुरू की। उसे इस काम के लिए केंद्र सरकार से स्कॉलरशिप भी मिली जिससे उसने संगीत नाटक एकेडमी के सहयोग से भांड पाथर पर काम किया और छह वर्ष में साठ नए भांड पाथरों के नाटक का मंचन किया।

उपलब्धियां : यासीन को अब तक कश्मीरी संस्कृति के संरक्षण के लिए स्कॉलरशिप मिल चुकी है। इसके अलावा वर्ष 2018-19 में उसे डोगरी थियेटर की उत्पत्ति के लिए भी संस्कृति मंत्रलय से जूनियर फैलोशिप मिल चुकी है। इसके अलावा यासीन संगीत नाटक एकेडमी की ओर से आयोजित नाट्य समागम में बतौर कोऑर्डिनेटर व तकनीशियन काम कर चुके हैं। वह देश के नामी निर्देशकों आदिल हुसैन, हरीश खन्ना, बंसी लाल कौल व मोती लाल केमू के साथ भी बतौर सहायक काम कर चुके हैं। अपने पिता की राह पर चलते हुए यासीन अपनी कलम भी चलाते हैं। वह कई पत्र-पत्रिकाओं में लेख भी लिखते हैं और पुरातन विधाओं पर शोध भी कर रहे हैं।

Posted By: Rahul Sharma

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