किश्तवाड़, बलवीर सिंह जम्वाल: आज मकर संक्रांति से मचैल में माता चंडी के दरबार के कपाट तीन महीने के लिए बंद हो जाएंगे। बैसाखी के दिन फिर धूमधाम से मंदिर के कपाट खोले जाएंगे। मुख्य मंदिर में प्रतिष्ठापित महाकाली की मूर्ति को हर साल की भांति वहां से उठाकर 100 मीटर की दूरी पर स्थित पहलवान सिंह के घर की छत पर बने छोटे मंदिर में स्थापित किया जाएगा। यह परंपरा सदियों से चली आ रही है।

इस आस्था के पीछे क्या गुढ़ रहस्य है, आइए हम बताते हैं। मंदिर के मुख्य पुजारी मनोज कुमार माता महाकाली की मूर्ति को पूजा-अर्चना के बाद आज भव्य मंदिर से पूरी रीति-रिवाज के मुताबिक उठाकर पहलवान सिंह के घर में बने छोटे से मंदिर में ले जाकर स्थापित करेंगे। माता महाकाली इस छोटे मंदिर में तीन महीने तक रहेंगी। जब बैसाखी का त्योहार आएगा तो उस दिन मचैल माता को ढोल-नगाड़ों के साथ छोटे मंदिर से उठाकर फिर मुख्य मंदिर में माता चंडी और सरस्वती की मूर्ति के साथ स्थापित किया जाएगा।

मायका माना जाता है पहलवान सिंह का घर: मचैल निवासी पहलवान सिंह ने बताया कि उनका घर माता महाकाली का मायका माना जाता है। माता महाकाली हर साल सर्दियों के दिनों में मकर संक्रांति को तीन महीने के लिए अपने मायके में आ जाती हैं। बताया जाता है कि काफी साल पहले लेह के जंस्कार इलाके में अकाल की स्थिति बन गई। महामारी से लोगों की मौत होने लगी। उस समय वहां के किसी चेले ने कहा कि अगर माता महाकाली की मूर्ति मचैल में माता चंडी के दरबार में प्रतिष्ठापित की जाए तो इस अकाल स्थिति से बचा जा सकता है। तभी वहां के सारे बौद्ध धर्म के लोगों ने माता के दरबार में मूर्ति चढ़ाने का फैसला किया। वे चांदी की मूर्ति बनाकर मचैल पहुंचे। मचैल में आकर वे पहलवान सिंह के घर में ठहरे और मूर्ति को उनके घर की छत पर रखा। जब छत के ऊपर मूर्ति को खुला रखा गया तो मचैल गांव के लोगों ने इकट्ठे होकर कहा कि मूर्ति को घर के अंदर नहीं रखा जा सकता। छत पर भी खुले में रखना माता महाकाली का अपमान होगा। उस दौरान लोगों ने छत के ऊपर एक लकड़ी के मंदिर का निर्माण किया।

दुल्हन की तरह पहलवान सिंह के घर से विदा हुई थी महाकाली: माता महाकाली की मूर्ति को पहलवान सिंह के घर की छत पर बनाए गए छोटे से मंदिर में काफी दिनों तक रखा गया। उसके बाद बैसाखी के दिन अच्छा मुहूर्त देखकर मूर्ति को पालकी में सजाकर वहां से विदा किया गया। पहलवान सिंह के घर से मां को ऐसे ले जाया गया जैसे किसी दुल्हन को विदा किया जाता है। बताया जाता है कि जब पालकी पहलवान सिंह के घर से निकली तो मचैल के लोग ढोल-नगाड़े बजाते और नाचते-गाते हुए पालकी के आगे-आगे चल रहे थे। बड़ी धूमधाम से मूर्ति को मुख्य मंदिर में माता चंडी की पिंडी के साथ प्रतिष्ठापित किया गया। मूर्ति प्रतिष्ठापित होने के बाद जंस्कार के लोगों को महामारी से छुटकारा मिला। वहां पर भी उन्होंने माता का त्रिशूल स्थापित किया। तबसे ही बौद्ध धर्म के लोग भी मचैल माता को मानते हैं। यह परंपरा उस समय से निरंतर चली आ रही है। 

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