श्रीनगर, नवीन नवाज। Qurrat-Ul-Ain:  उम्मीद की किरण और कुर्रत। दोनों आज कश्मीर में एक-दूसरे का पर्याय बन चुके हैं। अगर किसी को कहीं कोई बेसहारा बच्चा नजर आता है तो वह आश को याद करता है। अगर किसी गरीब की बेटी की शादी है या शादी नहीं हो रही है तो वह किसी के आगे मदद के लिए हाथ फैलाने के बजाय आश का सहारा लेता है। पढ़ाई के लिए पैसा आड़े आ रहा है तो भी आस नाम की संस्था हम राही बन जाती है।

वर्ष 2011 में कुर्रत-उल-ऐन ने अकेले जो सफर शुरू किया था, वह अब कारवां बनता जा रहा है। घाटी में कुकुरमुत्ता की तरह अनाथाश्रम आश के कारण बंद हो चुके हैं। अगर कहीं कोई है तो वह वहां बच्चों को मुफ्त का खाना देकर अपनी जिम्मेदारी की इत्तिश्री नहीं समझ सकता, उसे बच्चों की पढ़ाई, उनकी साफ-सफाई, स्वास्थ्य और उनके मानसिक विकास की जिम्मेदारी को भी निभा रहा है।

आठ साल के दौरान घाटी में एक हजार से ज्यादा बच्चों की मदद आश ने की है। वह अकेली महिलाओं को आर्थिक व मानसिक रूप से मजबूत बना उन्हें बच्चों को अनाथाश्रम में भेजने के बजाय साथ रख उन्हें जिंदगी में कुछ करने का हौसला देती हैं। 100 से ज्यादा लड़कियों की शादी जो दहेज व अन्य कारणों से नहीं हो रही थी, सामूहिक निकाह के जरिए दो वर्षों में कुर्रत के प्रयासों से हुई है।

इंजीनियरिंग की पढ़ाई छोड़ी: अपने सफर के बारे में जागरण के साथ बातचीत में कुर्रत हंसते हुए कहती हैं कि मेरी मां और परिवार के अन्य लोग मुझे इंजीनियर बनाना चाहते थे। घर का माहौल कुछ रूढ़िवादी था। इसलिए जब मैंने इंजीनियर की पढ़ाई छोड़ समाजसेवा के क्षेत्र में बढ़ने का फैसला किया तो विरोध भी हुआ। समाज सेवा में पहले स्नातक, फिर मास्टर्स किया। 

Posted By: Sanjay Pokhriyal

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