जम्मू, जागरण संवाददाता : कारगिल युद्ध में सेना के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करने वाले पोर्टरों ने सेना के समकक्ष लाभ दिए जाने के सर्वोच्च न्यायालय के आदेश को लागू करने की मांग की। उम्र दराज हो चुके पोर्टरों ने केंद्र सरकार पर आरोप लगाया कि कि उन्हें युद्ध जीतने के बाद उन्हीं के हाल पर छोड़ दिया गया।युद्ध से पहले सेना में भर्ती करने के जो दावे किए गए, वे सभी खोखले साबित हुए। बीते 22 साल पहले वर्ष 1999 में कारगिल युद् के दौरान उनके कई साथी युद्ध भूमि में बलिदान हो गए। उन्होंने भी वही शार्य और पराक्रम दिखाया और अपनी जान पर खेल कर टाइगर हिल को दुश्मनों के चुंगल से मुक्त करवाया।इस दौरान यूनियन के प्रधान दर्शन लाल ने कहा कि कारगिल युद्ध में भारतीय सेना द्वारा चलाए गए आपरेशन विजय में हजारों की संख्या में पोर्टरों ने भाग लिया था।

युद्ध जीतने के बाद राज्य सरकार ने उन्हें सम्मानित किया था और यह आश्वासन दिया था कि जल्द ही उनकी बहादुरी के लिए उन्हें सरकारी नौकरी दी जाएगी। चूंकि उनके द्वारा दी गई सेवा को जंग के दौरान की गई सेवा के तौर पर गिना गया है। आश्वासन के वर्षो बीत जाने के बावजूद उन्हें नौकरी नहीं दी गई। दर्शन लाल ने बताया कि प्रदर्शन में जिला जम्मू, सांबा, कठुआ, अखनूर, पुंछ तथा राजौरी से आए पोर्टर शामिल है। उन्होंने कहा कि अधिकतर पोर्टर की आयु अब सरकारी नौकरी के योग्य नहीं रही। राज्य सरकार ने यदि उन्हें जल्द नौकरी नहीं दी तो वे उग्र प्रदर्शन करने को मजबूर हो जाएंगे। इन पोर्टरों का कहना है कि सेना की एक आवाज पर उन्होंने अपनी जान की परवाह न करते हुए कारगिल युद्ध में पहुंच गए थे। वहां सेना के साथ कंधे से कंधा मिलाकर हमने गोला बारूद चोटियाें तक पहुंचाया और कई घायल सैनिकों को भी कंधे पर उठाकर नीचे अस्पतालों में पहुंचाया।

हमें सरकार से उम्मीद थी कि हमारी देशभक्ति व जज्बे को सम्मान मिलेगा लेकिन युद्ध समाप्ति के बाद से हमारी सुध नहीं ले गई। कई पोर्टर युद्ध में शहीद भी हुए थे लेकिन उनको भी शहीद का सम्मान नहीं मिला। प्रदर्शन कर रहे पोर्टरों ने सरकार को चेतावनी दी कि अगर उनकी मांग पूरी नहीं की गई और उनको कहीं और नौकरी नहीं मिली तो वे लोग आंदोलन करने के लिए सड़कों पर आ जाएंगे।