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कश्मीर की मस्जिदों में अब एक सुर में गूंजेगा खुतबा, धार्मिक विद्वान तय करेंगे जुमे के उपदेशों के विषय

By Naveen NawaazEdited By: Hema Sharma
Published: Tue, 13 Oct 2026 12:53 PM (IST)

जम्मू-कश्मीर वक्फ बोर्ड मस्जिदों में जुमे के खुतबों को मानकीकृत करने की तैयारी में है, जिसके लिए धार्मिक विद्वानों की एक समिति विषय तय करेगी।

वक्फ बोर्ड की नई पहल से अलगाववादी एजेंडे पर लगेगा ब्रेक।

वक्फ बोर्ड की नई पहल से अलगाववादी एजेंडे पर लगेगा ब्रेक।

HighLights

  1. वक्फ बोर्ड जुमे के खुतबों के विषय मानकीकृत करेगा

  2. धार्मिक विद्वानों की समिति उपदेशों के मुद्दे तय करेगी

  3. सामाजिक मुद्दों पर जागरूकता और दुरुपयोग रोकना लक्ष्य

नवीन नवाज, जम्मू। जम्मू-कश्मीर में जुमे की नमाज के दौरान मस्जिदों से दिए जाने वाले खुतबों यानी धार्मिक उपदेशों में समन्वय स्थापित करने की पहल ने धार्मिक संस्थानों की सामाजिक और सार्वजनिक भूमिका को फिर चर्चा में ला दिया है।

जम्मू-कश्मीर वक्फ बोर्ड अपने अधीन आने वाली मस्जिदों में शुक्रवार के उपदेशों के लिए साझा विषय निर्धारित करने की तैयारी कर रहा है। इसके लिए धार्मिक विद्वानों की समिति बनाने का प्रस्ताव है, जो तय करेगी कि इमाम और खतीब किन मुद्दों को प्रमुखता दें।

नशे की बढ़ती समस्या, महिलाओं से जुड़े प्रश्न, नैतिक मूल्यों और सामाजिक जिम्मेदारियों के साथ इस पहल के व्यापक संदर्भ में मस्जिदों के मंच का दुरुपयोग रोकने तथा हिंसा और कट्टरपंथ के विरुद्ध जिम्मेदार धार्मिक संवाद की जरूरत भी महत्वपूर्ण है।

वक्फ बोर्ड के कार्यकारी अधिकारी इश्तियाक मोहि-उद-दीन ने विभिन्न जिलों के धार्मिक उपदेशकों के साथ आनलाइन बैठक में इस व्यवस्था पर चर्चा की। उन्होंने वक्फ के दायरे से बाहर की मस्जिदों को भी इस पहल से जोड़ने के लिए सुझाव मांगे।

इससे स्पष्ट है कि बोर्ड के सामने केवल अपने अधीन धार्मिक संस्थानों में समन्वय स्थापित करने का प्रश्न नहीं, बल्कि व्यापक स्तर पर धार्मिक नेतृत्व को साझा सामाजिक मुद्दों पर साथ लाने की चुनौती भी है।

एलओसी के साथ सटे उड़ी सेक्टर में एक मदरसे के संचालक मौलवी फारूक अहमद बट ने कहा कहा कि प्रस्तावित समिति का गठन, उसके अधिकार और सभी मस्जिदों तक व्यवस्था का विस्तार अभी अलग-अलग स्तरों पर स्पष्ट किए जाने वाले विषय हैं।

उन्हाेंने कहा कि हमें यह ध्यान रखना होगा कि इससे किसी की धार्मिक भावनाएं आहत न हों,यह कहीं धार्मिक मामलों में अनावश्यक हस्ताक्षेप न बने। कश्मीर की मस्जिदें लाखों लोगों के लिए इबादत, सामाजिक सहयोग और धार्मिक मार्गदर्शन के केंद्र भी हैं।

2019 से पहले का दौर, मस्जिदों के मंच पर भी उठे थे सवाल

कश्मीर मामलों के जानकार रमीज मखदूमी ने कहा कि कश्मीर के राजनीतिक इतिहास में मस्जिदों की भूमिका को समझने के लिए 2019 से पहले के घटनाक्रमों पर नजर डालना जरूरी है।

घाटी में अलगाववादी राजनीति, आतंकवाद और विभिन्न दौर के हिंसक प्रदर्शनों के दौरान धार्मिक पहचान और सामुदायिक नेटवर्क का इस्तेमाल लोगों को लामबंद करने के लिए किए जाने के आरोप लगते रहे हैं।

अक्सर कई अलगाववादी नेता शुक्रवार को अपने खुतबों में जिहाद और आजादी के नारे देते रहे हैं। यहां शुक्रवार का इंतजार किया जाता था कि फलां अलगाववादी नेता अपने खुतबे में क्या कहेगा जो आने वाले समय में कश्मीर के राजनीतिक घटनाक्रम का संकत देगा

वक्फ बोर्ड की पहल से अलगाववादी प्रचार पर अंकुश की उम्मीद

कश्मीर मामलों के एक अन्य जानकारी सलीम रेशी ने कहा कि वर्ष 2008, 2010 और उसके बाद 2016 में हिजबुल मुजाहिदीन के आतंकी बुरहान वानी की मौत के बाद घाटी में लंबे समय तक हिंसक प्रदर्शन हुए थे।

उस दौर में युवाओं की बड़ी संख्या में भागीदारी, पथराव की घटनाओं और सुरक्षा बलों के साथ टकराव ने प्रदेश की सुरक्षा व्यवस्था के सामने गंभीर चुनौतियां खड़ी की थीं।

अलगाववादी संगठनों की लामबंदी और युवाओं तक पहुंचने वाले संदेशों की भूमिका भी सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बनी थी। उस समय हमने देखा की कई जगह मस्जिदों में जिहादी तराने और आजादी के नारे गंजूते थे।

इससे कई किशोर प्रभावित हुए,कई गुमराह होकर हिंसा का रास्ते पर गए। इसलिए मस्जिदों के धार्मिक मंच का जिम्मेदार इस्तेमाल सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है।

लेकिन यह अंतर भी जरूरी है कि किसी विशेष घटना में उकसावे या गैरकानूनी गतिविधि के आरोप को सभी मस्जिदों और मौलवियों पर लागू नहीं किया जा सकता।

सलीम रेशी ने कहा कि युवाओं का आतंकवाद की ओर आकर्षित होना भी किसी एक कारण से नहीं समझा जा सकता। कट्टरपंथी प्रचार, आतंकवादी संगठनों की भर्ती गतिविधियां, व्यक्तिगत संपर्क, ऑनलाइन सामग्री और स्थानीय राजनीतिक परिस्थितियां इसमें अलग-अलग भूमिका निभा सकती हैं।

ऐसे में धार्मिक नेतृत्व की जिम्मेदारी बढ़ जाती है कि वह हिंसा और आतंकवाद के विरुद्ध स्पष्ट संदेश दे तथा युवाओं को शिक्षा, रोजगार, रचनात्मक गतिविधियों और शांतिपूर्ण सामाजिक भागीदारी की ओर प्रेरित करे।

वक्फ बोर्ड की प्रस्तावित पहल इस संदर्भ में एक अवसर बन सकती है। यदि खुतबों में सामाजिक समस्याओं के साथ शांति, मानवीय मूल्यों और हिंसा से दूर रहने के संदेश को भी स्थान मिलता है, तो धार्मिक मंच जनजागरूकता में सकारात्मक भूमिका निभा सकता है।

खुतबे के विषय तय होंगे, धार्मिक विद्वानों की होगी भूमिका

वक्फ बोर्ड की अध्यक्ष डा सैयद दरख्शां अंद्राबी ने कहा है कि खुतबे आस्था, समाज और क्षेत्र के भविष्य से जुड़े होते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि पैगंबर मोहम्मद की शिक्षाओं से संबंधित पारंपरिक उपदेशों में बदलाव नहीं किया जाएगा।

प्रस्तावित व्यवस्था के तहत समसामयिक मुद्दों पर इमामों और खतीबों के बीच समन्वय स्थापित करने का प्रयास किया जाएगा।अंद्राबी के अनुसार, उपदेशों के विषयों का चयन धार्मिक विद्वानों की समिति करेगी और इसमें बोर्ड अध्यक्ष या अधिकारियों की सीधी भूमिका नहीं होगी। नशे की लत, महिलाओं से जुड़े मुद्दे और अन्य सामाजिक बुराइयां इस पहल के प्रमुख विषयों में शामिल हो सकती हैं।

उन्होंने कहा कि यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना होगा। साझा विषय निर्धारित करने का अर्थ आवश्यक रूप से यह नहीं है कि प्रत्येक मस्जिद में पूरा खुतबा शब्दशः एक जैसा पढ़ा जाएगा। समिति किन मुद्दों को चुनेगी, स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार उनकी व्याख्या की कितनी गुंजाइश होगी और धार्मिक उपदेशकों की स्वतंत्रता सुरक्षित रखी जाएगी।

कश्मीर के सूफी इस्लाम की परम्परा को आगे बढ़ाना जरुरी

कश्मीर के धार्मिक-सामाजिक मामलों के जानकार और अहल ए सुन्नत कश्मीर के प्रधान ख्वाजा फारूक अहमद रेंजू शाह ने कहा कि कश्मीर में खुतबे यहां इस्लाम की रोशनी फैलाने वाले बुलबुल शाह और शाह ए हमदान के आदर्शाों पर आधारित होने चाहिए,क्योंकि वह यहां सभी को स्वीकार्य हैं।

उन्होंने इंसानियत, मुहब्बत का पैगाम दिया, उन्होंने हिंसा का विरोध किया और हमेशा सामाजिक बुराईयों के खिलाफ लोगों को सचेत किया।

कश्मीर की राजनीति में धार्मिक मंचों का महत्व

कश्मीर मामलों के जानकार सैयद अमजद शाह ने कहा कि जम्मू-कश्मीर का राजनीतिक परिदृश्य पहचान, प्रतिनिधित्व, संवैधानिक स्थिति और केंद्र तथा स्थानीय राजनीतिक नेतृत्व के संबंधों जैसे मुद्दों से लंबे समय से प्रभावित रहा है।

अगस्त 2019 में अनुच्छेद 370 के प्रावधानों में बदलाव और राज्य के पुनर्गठन के बाद केंद्र शासित प्रदेश की व्यवस्था अस्तित्व में आई। वर्ष 2024 के विधानसभा चुनावों के बाद निर्वाचित सरकार की वापसी ने प्रदेश की राजनीति को नया संदर्भ दिया। इस पृष्ठभूमि में धार्मिक संस्थानों से जुड़े फैसलों का असर प्रशासनिक व्यवस्था से आगे बढ़कर सामाजिक विमर्श तक पहुंच सकता है।

कश्मीर में मस्जिदें धार्मिक गतिविधियों के साथ सामुदायिक पहचान, सामाजिक संवाद और सार्वजनिक विचार-विमर्श के केंद्र भी रही हैं। इसलिए उनके मंचों पर दिए जाने वाले संदेशों की सामाजिक संवेदनशीलता और प्रभाव को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

यदि खुतबों के माध्यम से नशामुक्ति, शिक्षा, सामाजिक सौहार्द और हिंसा से दूर रहने का संदेश दिया जाता है, तो इससे समुदायों के बीच सकारात्मक संवाद को बढ़ावा मिल सकता है।।

धार्मिक मंचों पर हिंसा या कट्टरपंथ के समर्थन को रोकने का प्रयास कानून के अनुरूप होना चाहिए और किसी समुदाय या धार्मिक विचारधारा को सामूहिक रूप से संदेह के दायरे में नहीं लाना चाहिए।

गैर-वक्फ मस्जिदों तक पहुंचना सबसे बड़ी चुनौती

बिलाल बशीर ने कहा कि वक्फ बोर्ड के सामने व्यावहारिक चुनौती यह है कि जम्मू-कश्मीर की सभी मस्जिदें उसके प्रत्यक्ष प्रशासनिक दायरे में नहीं आतीं। ऐसे में प्रस्तावित व्यवस्था को व्यापक स्तर पर स्वीकार्य बनाने के लिए स्थानीय मस्जिद समितियों, इमामों और धार्मिक संगठनों के साथ संवाद जरूरी होगा।

जम्मू संभाग और कश्मीर घाटी की सामाजिक परिस्थितियों तथा स्थानीय प्राथमिकताओं में भी अंतर है। इसलिए साझा विषयों का निर्धारण करते समय स्थानीय जरूरतों की अनदेखी नहीं होनी चाहिए।

धार्मिक विद्वानों की समिति को ऐसे मुद्दों को प्राथमिकता देनी होगी, जिन पर व्यापक सहमति बन सके और जिनके माध्यम से समाज को सकारात्मक दिशा में प्रेरित किया जा सके।

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