6 पैसे में बिकी लकड़ी से शुरू हुई जिंदगी, सिर से उठा पिता का साया; कैसे हरबंस सिंह ने हजारों बच्चों का संवारा भविष्य
जम्मू-कश्मीर के जाने-माने शिक्षाविद् और गुरु नानक एजुकेशन ट्रस्ट के चेयरमैन प्रो. हरबंस सिंह का लेह में निधन हो गया, जिससे शिक्षा जगत में शोक की लहर है।
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प्रो. हरबंस सिंह के प्रेरणादायक जीवन की संघर्ष गाथा।
HighLights
जाने-माने शिक्षाविद् प्रो. हरबंस सिंह का लेह में निधन
गरीबी से उठकर हजारों विद्यार्थियों को शिक्षा का मार्ग दिखाया
गुरु नानक एजुकेशन ट्रस्ट के चेयरमैन रहे, समाज सेवा में अग्रणी
जागरण संवाददाता, जम्मू। जम्मू कश्मीर के जाने माने शिक्षाविद्ध एवं गुरु नानक एजूकेशन ट्रस्ट व गुरु गोबिंद सिंह पब्लिक हायर सेकेंडरी स्कूल कुंजवानी के चेयरमैन प्रो. हरबंस के निधन के बाद शिक्षा जगत मे शोक की लहर है।
चार अक्टूबर को लेह में उनका निधन हो गया था जबकि रविवार को उनकी याद में अंतिम अरदास गुरुद्वारा फतेह सिंह गांधी नगर में आयोजित हो रही है जिसमें उनके परिवार के सदस्यों के अलावा शहर के विभिन्न गणमान्य व राजनीतिक, सामाजिक लोग भी शामिल होंगे।
8 वर्ष की आयु में उठाया लकड़ियों का बोझा
कभी महज आठ वर्ष की आयु में सिर पर लकड़ी का बोझ उठाकर पांच-छह किलोमीटर पैदल चलने वाले बालक हरबंस सिंह ने हजारों विद्यार्थियों के जीवन में शिक्षा का उजाला फैलाया।
जिस लकड़ी की गठरी कभी छह पैसे में बिकी थी, वही घटना प्रो. हरबंस सिंह के जीवन का ऐसा मोड़ बनी, जिसने उन्हें मेहनत और संघर्ष का रास्ता दिखाया। चार अक्टूबर को लेह में उनके निधन के साथ विभाजन की त्रासदी से शुरू हुई उनकी जीवन यात्रा का अंत हुआ।
13 जनवरी 1940 को मुजफ्फराबाद के गांव मोराह में जन्मे प्रो. सिंह ने छह वर्ष की उम्र में विभाजन का दर्द झेला। परिवार को घर-बार छोड़कर जम्मू आना पड़ा और पिता का साया भी छिन गया।
तीन भाइयों और दो बहनों के साथ परिवार ने नगरोटा के शरणार्थी शिविर में तंबू में जीवन शुरू किया। आठ वर्ष की उम्र में वह परिवार की मदद के लिए मजदूरी करने लगे।
गरीबी को पढ़ाई के रास्ते में नहीं आने दिया
मुश्किलों के बावजूद उन्होंने शिक्षा जारी रखी। सेंट्रल खालसा अनाथालय, अमृतसर और खालसा कालेज से पढ़ाई के बाद 1958 में 16 वर्ष की उम्र में रियासी के खेरालैंड गांव में प्राथमिक शिक्षक बने।
नौकरी के साथ बीएससी, बीए, बीएड और 1970 में पंजाबी साहित्य में एमए किया। अरनास, कोह मनासा और ऊधमपुर में अध्यापन के बाद एमएएम कालेज और गवर्नमेंट कालेज आफ एजुकेशन में सेवाएं दीं।
दस विद्यार्थियों से शुरू किया शिक्षा का सफर
1979 में गोल गुजराल कैंप में 10 विद्यार्थियों से अंग्रेजी माध्यम का स्कूल शुरू किया। बाद में कुंजवानी में दो कमरों और 158 विद्यार्थियों से शुरू हुआ संस्थान हायर सेकेंडरी स्कूल बना और एक समय यहां 1500 से अधिक विद्यार्थी पढ़ते थे।
उन्होंने गुरु नानक कालेज आफ एजुकेशन की स्थापना में भी अहम भूमिका निभाई। शिक्षा को वह व्यवसाय नहीं, समाजसेवा मानते थे।गुरु नानक एजुकेशन ट्रस्ट के माध्यम से उन्होंने बाढ़ पीड़ितों की सहायता, जरूरतमंदों को रजाइयां और प्रधानमंत्री राहत कोष में योगदान दिया। 2011 में अपनी पेंशन की राशि विधवाओं के सशक्तीकरण के लिए समर्पित की। पत्नी राजेंद्र कौर के निधन के बाद साहित्य से जुड़े और कविता, आत्मकथा व अन्य विधाओं में लेखन किया।
