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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Aug 03, 2022 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

Jammu : डोगरी लेखिका प्रो. वीणा गुप्ता सौहार्द सम्मान 2021 से सम्मानित, जानिए डोगरी के उत्थान में उनका क्या रहा योगदान

By Rahul SharmaEdited By:
Published: Wed, 03 Aug 2022 02:12 PM (IST)

प्रो. वीणा गुप्ता को डोगरी में पहली बार पीएचडी करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। वह अपने अकादमिक करियर के ...और पढ़ें

जम्मू की प्रो. वीणा गुप्ता ने कई उपन्यासों का अनुवाद किया हुआ है।
जम्मू की प्रो. वीणा गुप्ता ने कई उपन्यासों का अनुवाद किया हुआ है।

जम्मू, जागरण संवाददाता : उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान ने वर्ष 2021 के सम्मान, पुरस्कारों की घोषणा कर दी है। जम्मू की प्रो. वीणा गुप्ता को सौहार्द सम्मान 2021 से सम्मानित किया गया है। उन्हें इस सम्मान के रूप में 2.50 लाख की इनामी राशि प्रदान की जाएगी। डोगरी के उत्थान और विकास के लिए गंभीरता से किए कार्यो की जब बात आती है तो प्रो. वीणा गुप्ता एक ऐसा नाम है, जो सबसे पहले हमारे सामने आता है।विनम्र और शांत प्रो. वीणा गुप्ता बहुत से डोगरी लेखकों के लिए प्रेरणा हैं।

31 अक्टूबर 1950 को जन्मी वीणा गुप्ता एक जानी-मानी साहित्यिक हस्ती हैं। जिन्होंने एक मार्गदर्शक शक्ति के रूप में साहित्य के क्षेत्र में कई नए लोगों को प्रकाशित किया है। अगर डोगरी साहित्य की बात करें तो वह सभी पहलुओं पर विस्तार से चर्चा करने की अधिकारी रही हैं। साहित्यिक कार्यों में उन्हें सुनना हमेशा आनंददायक रहा है।

प्रो. वीणा गुप्ता को डोगरी में पहली बार पीएचडी करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। वह अपने अकादमिक करियर के दौरान संस्कृत में प्रथम श्रेणी के साथ, एमए डोगरी में प्रथम श्रेणी और प्रथम स्थान के साथ, भाषाविज्ञान में स्नातकोत्तर, डिप्लोमा उत्तीर्ण करने में उत्कृष्ट रही हैं। डोगरी, हिंदी, संस्कृत, पंजाबी और अंग्रेजी भाषाओं में धाराप्रवाह होने के कारण वह भाषाविज्ञान, व्याकरण, अनुवाद और लोककथाओं में विशिष्ट हैं।

डोगरी साहित्य में उनका योगदान : मातृभाषा डोगरी में उनके महान योगदान पर एक नज़र डालें तो यहां यह जोड़ना अनुचित नहीं होगा कि उन्होंने अपने रचनात्मक कार्यों के माध्यम से डोगरी साहित्य के खजाने में व्यापक योगदान दिया है जो महत्वाकांक्षी प्रतिभाओं, छात्रों की पूरी मदद एवं मार्गदर्शन प्रदान करते हैं। डोगरी भाषाविज्ञान, व्याकरण पर उनकी पुस्तकें जैसे डोगरी व्याकरण, डोगरी भाषा, उद्धव और विकास, हिंदी डोगरी वार्ता निदेशक, डोगरी लिपि और उच्चारण सिखाने के लिए दिशानिर्देश, अनुवाद विज्ञान, सह-लेखक, डोगरी साहित्य के साहित्यिक मूल्यांकन पर पुस्तकें जैसे डोगरी कविता, मुख रुझान, साधे साहित्यकार, डोगरी साहित्य दे निर्माता आदि शामिल हैं।कई माेनोग्राफ जिनमें अश्विनी मगोत्रा, मोनोग्राफ, राम नाथ शास्त्री मोनोग्राफ आदि प्राकशित हैं।कई उपन्यासों का अनुवाद किया हुआ है।

डोगरी साहित्य पर उन्होंने किया काफी शोध : उन्होंने डोगरी साहित्य के विभिन्न पहलुओं और इसके ऐतिहासिक महत्व पर काफी शोध किया है। प्रमुख शोध कार्यों में जम्मू-कश्मीर कला संस्कृति एवं भाषा अकादमी जम्मू द्वारा प्रकाशित क्रिटिकल हिस्ट्री ऑफ डोगरी लिटरेचर, शालो पैरीज टूल्स ऑफ इंडियन लैंग्वेजेज , डोगरी भारत सरकार द्वारा वरिष्ठ भाषाविज्ञान आदि के रूप में प्रकाशित किया गया है। डोगरी पर कई संगोष्ठियों, सम्मेलनों और कार्यशालाओं में भी भाग लिया है और साथ ही आयोजित किया है। उनके द्वारा लिखे गए डोगरी भाषा, साहित्य, लोकगीत आदि के विभिन्न पहलुओं को कवर करने वाले 90 से अधिक पत्र और लेख प्रमुख राष्ट्रीय और क्षेत्रीय प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं। यहां यह जोड़ना प्रासंगिक है कि मूल कार्यों और अनुवादों के अलावा उन्होंने कई पुस्तकों और पत्रिकाओं के संपादक के रूप में व्यापक रूप से काम किया है। जिसमें 2001 से 2005 तक डोगरी शोध के छह खंड और पीजी डिपार्टमेंट ऑफ डोगरी द्वारा प्रकाशित नरोआ चापसम नरोआ जीवन शामिल हैं।

कई महत्वपूर्ण पदों पर रहकर किया डोगरी के लिए काम : जम्मू विश्वविद्यालयए डोगरी निकस ते विकास, भीमिन शादी दा डोगरी साहित्य, ताकाज़े ते उत्थान, पद्मश्री प्रोफेसर राम नाथ शास्त्री, व्यक्तित्व ते कृततव, साहित्यकार दीनू भाई पंत, दीनू भाई पंत दा कविता साहित्य, डुग्गर दे शालि ते भारतीय लेख भा ज्योति, डोगरी, झूल बरैया दे पट्टारा, डोगरी महाकाव्य, पूनी पूनी बत्ती रात, डोगरी गजलों का संग्रह, रामजी सीरन, डोगरी निबंधों का संग्रह, डोगरी साहित्य चा मिथजक ते इतिहास आदि। उन्होंने डोगरी लघु कथाओं, कविता आदि पर लगभग सात संकलनों का संपादन भी किया है। इसके लिए उन्होंने संकलित और संपादित भी किया है। 20वीं सादी दा डोगरी महिला लेखन, चुनमियान पंजाबी कहानियां, चुनमियान राजस्थानी कहानियां, चौनमिया कोंकणी कहानियां आदि और कुछ पुस्तकें भी प्रकाशित हो रही हैं। उन्होंने डोगरी संस्था जम्मू द्वारा प्रकाशित डोगरी की सबसे पुरानी और सबसे प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका नमी चेतना के 98 नंबरों का संपादन किया है और कक्षा पहली से 12 वीं तक और डिग्री स्तर के लिए भी संपादकीय बोर्ड के सदस्य के रूप में डोगरी विषय के लिए दस पुस्तकें तैयार और संपादित की हैं।

35 से अधिक वर्षों के अध्यापन का व्यापक अनुभव : वीना गुप्ता को स्नातकोत्तर स्तर पर 35 से अधिक वर्षों के अध्यापन का व्यापक अनुभव है। उनके पास 40 वर्षों का शोध अनुभव है।दो दर्जन से ज्यादा शोधकर्ताओं को पीएचडी और एएमफिल करवायी है। हजारों युवाओं को मातृभाषा डोगरी में लिखने के लिए प्रेरित किया एवं मार्ग दर्शन किया। उन्होंने अपने पूरे करियर में प्रमुख पदों पर कार्य किया है। जिसमें डोगरी विभाग के प्रमुख, जम्मू विश्वविद्यालय, डोगरी में संयोजक बोर्ड, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग में डोगरी विषय और भाषाविज्ञान में विशेषज्ञ, जम्मू-कश्मीर लोक सेवा आयोग, संघ लोक सेवा आयोग, डीन अकैडमिक आर्टस शामिल हैं।

साहित्य में उनके योगदान के लिए समय-समय पर किया गया सम्मानित : जम्मू विश्वविद्यालय, डोगरी विशेषज्ञ केंद्रीय संस्थान में सहायता अनुदान समिति में भारतीय भाषा मैसूर मानव संसाधन विकास मंत्रालय, महासचिव डोगरी संस्था जम्मू, आजीवन भाषाई सोसायटी ऑफ इंडिया डेक्कन कॉलेज पुणे, लोकगीत कांग्रेस भारत, राष्ट्र भाषा प्रचार समिति, संयोजक साहित्य अकादमी, नई दिल्ली में डोगरी सलाहकार बोर्ड की संयोजक बनी रही और कई सरकारी और गैर सरकारी सांस्कृतिक संगठनों की सदस्य रही। उन्हें जम्मू-कश्मीर कलाए संस्कृति और भाषा अकादमी, महाराष्ट्र राज्य साहित्य अकादमी, राष्ट्र भाषा प्रचार समिति वर्धा, मालवीय रंगमंच समिति उज्जैन, सूचना प्रौद्योगिकी केंद्र विभाग, नई दिल्ली आदि जैसे विभिन्न सरकारी और गैर-सरकारी संगठनों द्वारा सम्मानित किया गया है। साहित्य में उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए समय-समय पर सम्मानित किया गया है।

प्रो. वीणा ने कहा-मातृभाषा ही हमारी पहचान : प्रो. वीणा गुप्ता मातृभाषा डोगरी के कल्याण के लिए दृढ़ संकल्प के साथ काम करने वाली एक योद्धा के तौर पर सभी के लिए प्रेरणास्रोत रही हैं। उनका मानना ​​है कि हम एक ऐसे मुकाम पर पहुंच गए हैं। जहां यह महसूस करना होगा कि मातृभाषा ही हमारी पहचान है। अपनी जड़ों से चिपके रहने और अपनी सांस्कृतिक परंपराओं को बनाए रखने के लिए हमारे पास डोगरी को बचाने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। यह तभी हो सकता है जब हम इसे उचित सम्मान दें और इसे मातृभाषा मानें।