जम्मू, विवेक सिंह: बर्फीली चोटियां और अंगुली ट्रिगर पर। तापमान शून्य से करीब 35 डिग्री नीचे। शरीर में कुछ देर हलचल न करो तो खून भी जम जाए। ठंड इतनी कि दिमाग काम करना बंद कर दे। पलक झपकी तो सामने ताक में बैठा दुश्मन कोई खुराफात कर दे। ऐसी भीष्म परिस्थितियों और मुश्किल हालात में भी पूर्वी लद्​दाख में वास्तिविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर तैनात भारतीय रणबांकरों का जोश हिलोरे मार रहा है। 

हर-हर महादेव के जयघोष लगाते भारतीय जांबाजों की दहाड़ एलएसी पार तक जा रही है, जो चीनी सैनिकों में खौफ पैदा करने के लिए काफी है। भारतीय सेना के जवानों के इरादों में यह मजबूती और हौसला यूं ही नहीं आया। इन वीरों के प्रेरणास्रोत गलवन के शहीद हैं, जिनकी कुर्बानियों को याद कर जवान चीन को कभी न भूलने वाला सबक सिखाना चाहते हैं। इसके अलावा भारतीय सैन्य अधिकारियों के एलएसी के लगातार दौरे भी जवानों में जोश भर रहे हैं। वहीं गणतंत्र दिवस पर गलवन के शहीदों को सम्मान देने की घोषणा से जवानों का हौसला दोगुना हो गया है।

चीन ने पूर्वी लद्​दाख में एलएसी के निकट अंदरूनी इलाकों से हाल ही में अपने दस हजार सैनिक हटा दिए हैं। इसकी वजह ठंड को माना जा रहा है। दूसी ओर भारतीय सेना के जवान फैलादी हौसले के साथ डटे हैं। इन्हीं जवानों के दम पर थल सेनाध्यक्ष नरवाने ने भी कहा है कि एलएसी पर हमारी सेना तब तक डटी रहेगी, जब तक बातचीत से हल नहीं निकलता।

सैन्य सूत्रों के अनुसार, गलवन घाटी में हिंसक भिड़ंत के बाद क्षेत्र में सेना कई गुणा मजबूत हुई है। इस समय बर्फ में युद्ध लड़ने के लिए प्रशिक्षित करीब 50 हजार सैनिक पूर्वी लद्​दाख में है। इनमें से काफी अधिकारी व जवान ऐसे हैं, जिन्हें पश्चिमी लद्​दाख में सियाचिन गलेशियर पर शून्य से कम तापमान में युद्ध लड़ने की महारत है।

सेना की 16 बिहार के कमान अधिकारी समेत 20 सैनिकों ने गत वर्ष जून महीने में देश के लिए जान देने से पहले 43 चीनी सैनिकों को मार गिराया था। यह हाथों हाथ लड़ाई गलवन के पेट्रोलिंग प्वायंट 14 पर हुई थी। इस वर्ष 26 जनवरी को कर्नल संतोष बाबू व उनके साथियों को मिलने वाले वीरता पदक भी सरहद पर खड़े सैनिकों के लिए प्रेरणास्त्रोत होंगे।

पूर्वी लद्दाख में दुरबुक-श्योक-दौलत बेग ओल्डी सड़क पर इन केएम-20 पोस्ट के निकट इन शहीदों की याद में स्थापित स्मारक भी सेना के जज्बे काे बल देता है। सोलह बिहार के वीरों ने आपरेशन स्नो लेपर्ड के तहत चीन के सैनिकों को गलवन घाटी के वाइ जंक्शन इलाके से खदेड़ा था।

भारतीय जवानों का विश्व में कोई सानी नहीं: चीन से सटे इलाकों की सुरक्षा में तैनात रहे सेना के सेवानिवृत्त मेजर जनरल जीएस जम्वाल ने कहा कि पूर्वी लद्​दाख में छह महीनेां में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रक्षामंत्री राजनाथ सिंह के साथ चीफ ऑफ डिफेंस जनरल बिपिन रावत, थल सेना अध्यक्ष, वायु सेना प्रमुख के निरंतर दौरों से सेना की आपरेशनल तैयारियों में लगातार वृद्धि हुई है। दुश्मन भली भांति जान गया है कि अब उसका सामना वर्ष 1962 की नहीं, वर्ष 2021 की भारतीय सेना से है, जिसके बेड़े में अब आधुनिक हथियार, गोला बारूद है व हौंसले में उसके जवानों का विश्व में कोई सानी नहीं है। छह महीनों की तैयारी से चीन का संदेश मिल गया है कि भारतीय सेना से लड़ाई मंहगी पड़ेगी।

हर चुनौती के लिए तैयार है सेना : ब्रिगेडियर पांडे

सेना की उत्तरी कमान के बीजीएस, ब्रिगेडियर बृजेश पांडे का कहना है कि भारतीय सेना लद्दाख जैसे इलाके में किसी भी चुनौती का सामना करने के लिए तैयार है। हमारे सैनिकों का हौंसला बुलंद है। पूर्वी व पश्चिमी लद्दाख में तैनात सैनिक हर प्रकार के मौसम का सामना करने के लिए प्रशिक्षित हैं। कड़ी ठंठ से निपटने के लिए जवानों को हर प्रकार की सुविधा उपलब्ध करवाई जा रही है।

लद्दाख में बर्फ में लड़ने में दक्ष है भारतीय सेना: लद्दाख जैसे दुर्गम इलाके में भारतीय सेना हर समय आपरेशनल मोड में रहती है। भारतीय सेना वर्ष 1984 से लद्दाख में विश्व के सबसे उंचे युूद्ध् स्थल सियाचिन में दुश्मन के साथ निष्ठुर मौसम के साथ लड़ रही है। लद्दाख के कारगिल में वर्ष 1999 में भारतीय सेना ने अपने बुलंद हौंसले से दुश्मन को परास्त किया था। अब चीन का सामना स्पेशल फोर्स, गोरखा, कारगिल जीतने वाली इन्फैंटरी की बटालियनों, लद्दाख स्काउट्स जैसी बटालियनें हैं जो युद्ध के मैदान में तप कर तैयार हुई हैं। वहीं सामने चीन की सेना में अनुभव व हौंसले, दोनों की कमी है।

चीन से बदला लेने को घात लगाए बैठे तिब्बती शेर: पूर्वी लद्दाख की बफीर्ली चोटियों के पर चीन से बदला लेने को तिब्बती शेर घात लगाए बैठे हैं। वे सेना के साथ पैरा कमांडो के रूप में चीन के खिलाफ मैदान में है। तिब्बती सैनिकों की स्पेशल फ्रंटियर फोर्स अपने शहीद डिप्टी लीडर 51 वर्षीय नईमा टेनजिन का बदला लेने के लिए मौके की तलाश में है। नईमा टेनजिन भारतीय सेना के लिए रणनीतिक रूप से बहुत अहम ब्लैक टाप चोटी पर कब्जा करते हुए शहीद हुए थे। उनके साथ 24 वर्षीय तिब्बती सैनिक टेनजिन लोधेन घायल हुए थे।

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