जम्मू, अवधेश चौहान। [जागरण विशेष] जहरीली खेती से धरा का अमृत कहा जाने वाला भूजल भी अपने गुण खो रहा है। खेती के लिए रसायनों के अंध इस्तेमाल के कारण जम्मू के बिश्नाह क्षेत्र में 30 गांवों का भूजल अब पीने लायक नहीं बचा है। पानी की जांच ने प्रशासन के भी कान खड़े कर दिए हैं और वह भूजल को पेयजल के तौर पर इस्तेमाल न करने की सलाह दे रहे हैं।

यहां बता दें कि पाकिस्तानी सीमा से सटा यह क्षेत्र जम्मू का सबसे हरियाली वाला क्षेत्र है। यहां की जमीन काफी उपजाऊ है। यहां के पानी को धरा के लिए अमृत के समान माना गया था। पर रसायनों के अंध इस्तेमाल ने इसकी गुणवता में काफी कमी देखी जा रही है। भूजल में हार्ड मैटर और नाइट्रेट जैसे तत्वों में काफी इजाफा हुआ है।

बिश्नाह और उसके साथ लगते गांवों में करीब पांच हजार हैंडपंप लगे हैं। पहले यही पानी पेयजल के लिए इस्तेमाल होता था। इनमें से दो हजार हैंडपंप के पानी में नाइट्रेट व फ्लोराइड की मात्र सामान्य से अधिक पाई गई है। विशेषज्ञों के अनुसार अत्याधिक यूरिया, डीएपी के अलावा फसलों और सब्जियों पर क्लोराइड के छिड़काव से भी पानी की गुणवता गिरती जा रही है।पीएचई सब डिवीजन के सहायक कार्यकारी अभियंता (एईई) सुनील सेठ का कहना है कि कुछ गांवों के हैंडपंप के पानी की जांच में रसायनों की मात्र सामान्य से काफी अधिक पाई गई है। हालांकि शेष गांवों में स्थिति इतनी भयावह नहीं है। लोगों को इस संबंध में सचेत किया है। साथ ही पानी को लैब में टेस्ट कराने की सलाह भी दी गई है।

श्री महाराजा गुलाब सिंह अस्पताल के एसोसिएट प्रोफेसर संजीव ढीगरा का कहना है कि पानी में कैल्शियम की मात्र ज्यादा होने के कारण किडनी में पथरी बन सकती है। फास्फोरस होने अधिक होने के कारण त्वचा संबंधी रोग हो सकते हैं। पानी में हर्डनेस अधिक होने के कारण भी पानी पीने लायक नहीं रहता।

बिश्नाह इलाके के किसान साल में तीन या चार फसलें लेते हैं। इसमें फसल के बीच में सब्जियां उगाई जाती हैं। सब्जियों और धान पर कीटनाशकों का खूब इस्तेमाल किया जाता है। यही रसायन अब भूगर्भ में पहुंचने लगे हैं। हालांकि भूगर्भ का पानी फसलों की सिंचाई के लिए खतरनाक नहीं है पर पेयजल के लिए इस्तेमाल से विशेषज्ञ इनकार करते हैं।

शिशुओं में ब्लू बेबी सिंडरोम की आंशका : शेर-ए-कश्मीर कृषि विश्विद्यालय के वैज्ञानिक डॉ. विकास शर्मा का कहना है कि पानी में अत्यधिक फ्लोराइड की मात्र से इंसान की हड्डियों पर असर पड़ता है। नाइट्रेट रसायन यूरिया में पाया जाता है। यह जमीन में रिसता रहता है। इस पानी के सेवन से नवजात शिशुओं में ब्लू बेबी सिंडरोम की आंशका रहती है। ज्यादातर कीट अब हल्के जहर से प्रभावित ही नहीं होते हैं और इनका सामना करने के लिये उन्होंने प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर ली है। ऐसे में फॉस्जीन जैसी गैस का उपयोग भी पेस्ट कंट्रोल के लिए होने लगा है। बीएचसी की खपत भी निरंतर बढ़ती जा रही है।

क्या आया बदलाव: कई गांवों में हैंडपंप के पानी का रंग मटमेला और बर्फ की तरह सफेद है। ऐसे में घबराकर ग्रामीणों ने हैंडपंप का पानी पीना बंद कर दिया। फिर पानी की जांच करवाई तो पता चला कि किस तरह अमृत पर भी रसायनों का प्रभाव दिख रहा है।

ग्रामीण अब नहाने-धोने में कर रहे इस्तेमाल: बिश्नाह गांव के लोग अब हैंडपंपों पर निर्भर नहीं है। पेयजल विभाग द्वारा पाइपों से मुहैया करवाया जा रहा है। हैंड पंपों के पानी का इस्तेमाल नहाने-धोने व अन्य कार्य के लिए ही किया जा रहा है। हालांकि अधिक गहरे खोदे गए ट्यूबवेल के जल पर इसका प्रभाव अभी नहीं दिखता है। एईई बिश्नाह का कहना है कि करीब 140 गांवों में पेयजल आपूर्ति नलों से की जा रही है।

जैविक खेती है उपाय: विशेषज्ञों के अनुसार रसायनों का इस्तेमाल कर जैविक खेती को बढ़ावा देना ही एकमात्र विकल्प है। गोबर, गोमूत्र और गुड़ को मिलाकर बनने वाले अमृत जल को कीटनाशक के तौर पर इस्तेमाल कर सकते हैं। इससे धरा में रसायनों के दुष्प्रभाव से बचा जा सकेगा। 

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Posted By: Rahul Sharma

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