जम्मू, गुलदेव राज । सरकार ने कश्मीर में सेब का न्यूनतम समर्थन मूल्य जारी कर सेब उत्पादकों को तो बड़ी राहत दे दी, मगर महक और स्वाद के लिए जम्मू के आरएसपुरा क्षेत्र की पहचान बनाने वाले पारंपरिक बासमती के उत्पादक किसानों को कोई पूछ नहीं रहा है। बासमती उत्पादक पिछले पांच साल से घाटा झेल रहे हैं और अब भी भेदभाव से प्रभावित हैं। उचित दाम न मिलने से किसान हताश है। दरअसल, राज्य के पुनर्गठन के बाद कश्मीर में उपजे हालात के बीच सरकार नेफेड के माध्यम से सेब को खरीद रही है, लेकिन जम्मू में बासमती की पैदावार करने वाले किसानों को नुकसान के बावजूद सरकार अनदेखा कर देती है।

आरएसपुरा का बासमती चावल राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय मंच पर अपनी खुशबू व महक का लोहा मनवा चुका है। इसके बावजूद दस्तूर ऐसा है कि सरकार ने हमेशा ही कश्मीरी सेब को ही मान दिया है। इस बार भी कश्मीर के सेब का सरकार अच्छा मूल्य दे रही है। डिलिशियस ए ग्रेड सेब का समर्थन मूल्य 48 से 52 रुपये प्रति किलो निकाला है। जबकि बी ग्रेड के सेब के लिए सरकार 32 से 36 रुपये व सी ग्रेड सेब के लिए 15.75 से 18 रुपये देगी। वहीं, आरएसपुरा बेल्ट में पारंपरिक बासमती धान तीन से साढ़े तीन हजार रुपये प्रति क्विंटल में भी मुश्किल से बिक पाता है। मजे की बात यह है कि वीआइपी कार्यक्रमों व समारोह में आरएसपुरा का ही बासमती चावल परोसा जाता है, जहां इसकी गुणवत्ता की वाहवाही होती है मगर इसके उत्पादकों को कोई नहीं पूछता। जम्मू कश्मीर में रही सरकारों के अलावा केंद्र सरकार ने बासमती उत्पादक किसानों के लिए न तो कभी न्यूनतम समर्थन मूल्य जारी किया और न ही उत्साह बढ़ाने के लिए बोनस दिया। नवंबर में आरएसपुरा में बासमती धान की फसल तैयार हो जाएगी। ऐसे में बासमती उत्पादक किसानों ने भी सरकार से न्यूनतम समर्थन मूल्य मांगा है। तहरीक-ए-किसान जम्मू कश्मीर के प्रधान किशोर कुमार का कहना है कि कम से कम छह हजार रुपये प्रति ङ्क्षक्वटल का न्यूनतम समर्थन मूल्य जारी होना चाहिए। वर्तमान में किसान जिस दाम पर बासमती बेच रहे हैं, उससे तो खेती का खर्च भी नहीं निकलता।

आइबी के पास 45 हजार हेक्टेयर में होती है खेती

आरएसपुरा बेल्ट जोकि अखनूर से सांबा तक की सीमांत पट्टी है, में 45 हजार हेक्टेयर भूमि पर पारंपरिक बासमती की खेती होती है। यहां से हर साल 1.15 लाख टन पैदावार होती है। कभी 60 हजार हेक्टेयर में यह खेती होती थी, मगर बाद में किसान हाइब्रिड बासमती की ओर बढ़ते गए जोकि कम समय में तैयार हो जाती है और अच्छी पैदावार भी होती है, लेकिन सीमांत क्षेत्र में अभी भी किसान बासमती की पारंपरिक खेती को संभाले हुए हैं। किसानों का कहना है कि लंबा समय लेने वाली बासमती के हवा से गिरने का जोखिम हमेशा बना रहता है मगर उनको तो यह खेती करनी ही है। यह पारंपरिक खेती पीढ़ियों से होती आ रही है।

आरएसपुरा की मिट्टी और चिनाब के पानी का है कमाल

दरअसल, यह रणवीर बासमती किस्म है, जिसका अपना बीज है। इसे किसान दशकों से संभालते चले आ रहे हैं। इस रणवीर बासमती चावल की अपनी अलग महक है। यानी जब चावल पकाए जाते हैं तो महक पड़ोस तक पहुंचती है। स्वाद में मिठास भी निराली है। बाद में सरकार ने इस बीज को उन्नत किया और यही बीज आज कल चल रहा है। इस पारंपरिक बासमती के बीज लेकर दूसरे राज्यों में भी लगाए गए और वहां फसल तो हुई मगर स्वाद व महक नहीं रही। आरएसपुरा बासमती ग्रोअर्स एसोसिएशन के प्रधान देवराज चौधरी का कहना है कि कुछ आरएसपुरा की मिट्टी की खासियत तो कुछ चिनाब नदी के पानी के जादू ने ही इस बासमती को खास बनाया है।

अब बासमती आर्गेनिक हो रही है

जम्मू कश्मीर एग्री इंटप्रेन्योरशिप डेवलपमेंट एसोसिएशन के प्रधान कुलभूषण खजुरिया ने कहा कि आरएसपुरा बेल्ट की बासमती अब तो आर्गेनिक ही है। सरकार ही पहल नहीं कर रही। इसे सरकार बाजार उपलब्ध कराए। अगर ऐसा नहीं कर सकती तो न्यूनतम समर्थन मूल्य जारी करे।

पूर्ण आर्गेनिक खेती से बनेगी बात

कृषि विभाग के उप निदेशक रहे सीएम शर्मा का कहना है कि आरएसपुरा बासमती उत्पादक किसानों को अपनी खेती को पूरी तरह से आर्गेनिक बनाना होगा। एक दिन ऐसा जरूर आएगा जब बासमती अंतर्राष्ट्रीय मार्केट में महंगे से महंगे दाम पर बिकेगी। आरएसपुरा बेल्ट की बासमती को आर्गेनिक में बदलने की दिशा में काम चल रहा है। 

Posted By: Rahul Sharma

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