श्रीनगर, नवीन नवाज। अफगानिस्तान पर तालिबान के कब्जे के बाद कश्मीर में जारी आतंकी हिंसा पर स्पष्ट असर के अभी तक कोई संकेत नहीं मिले हैं, लेकिन कश्मीरी सियासत इससे प्रभावित होने लगी है। नेशनल कांफ्रेेंस के अध्यक्ष डा फारुक अब्दुल्ला हाेें या फिर पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी की अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती, जहां माैका मिल रहा है तालिबान के प्रति अपनी मोहब्बत का इजहार करने से नहीं बच रहे हैं। हालांकि दोनों ने खुलकर तालिबान को मान्यता देने के लिए केंद्र सरकार से मांग नहीं की है, लेकिन कश्मीर की सियासत में अपना वजूद बचाए रखने के लिए वे तालिबान से ठीक उसी तरह अच्छे संबंधों पर जोर दे रहे हैं जिस तरह 5 अगस्त 2019 से पहले उन्हेें पाकिस्तान जरूरी नजर आता था।

जम्मू-कश्मीर के तीन बार मुख्यमंत्री और एक बार केेंद्रीय मंत्री रह चुके डा फारूक अब्दुल्ला ने 8 सितंबर काे अपने पिता की बरसी पर पत्रकारोें बातचीत करते हुए कहा कि तालिबान को इस्लाम के आदर्शों के अनुरुप हुकूमत करनी चाहिए। उसे अपने पड़ोसियों से अच्छे संबंध बनाने चाहिए। उसे किसी पर जुल्म नहीं करना चाहिए। उसी दिन पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी की अध्यक्षा और पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने भी कहा कि तालिबान अब हकीकत है।

तालिबान को हजरत मोहम्मद साहब के दिखाए रास्ते, शरियत और इस्लाम के उसूलों के मुताबिक इस्लामी हुकुमत लागू करनी चाहिए। उन्हेे औरतों, बच्चों, बुजुर्गाें और अल्पसंख्यकाेें को इस्लाम के मुताबिक पूरे अधिकार देने होंगे। पहले की तरह किसी पर जुल्म नहीं करना चाहिए। इससे पूर्व महबूबा मुफ्ती ने दक्षिण कश्मीर के कुलगाम में पहले अपने कार्यकर्ताओं के साथ और उसके बाद पत्रकारोें से बातचीत में कहा कि अगर केेंद्र सरकार ने अपनी कश्मीर नीतियों की समीक्षा कर सुधार नहीं किया तो उसका भी ठीक वैसा ही होगा जैसा अमरीका का अफगानिस्तान मेें हुआ है।

उन्होंने केंद्र को धमकाते हुए कहा कि अगर यहां लोगों के सब्र का बांध टूट गया तो आपको भी यहां से जाना पड़ेगा। फारुक अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती द्वारा जताए जा रहे तालिबान प्रेम के बीच पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला भी सामने आए। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार बताए कि क्या वह तालिबान को आतंकी मानती है या नहीं। अगर तालिबान आतंकी है तो फिर भारत सरकार उससे बातचीत क्यों कर रही है। उसके नेताओं से संपर्क क्यों साध रही है। अगर तालिबान को वह तंकी नहीं मानती तो वह उसे आतंकियों की सूची से बाहर निकलवाने की शुरुआत करे।

जम्मू कश्मीर यूनिटी फाउंडेशन के अध्यक्ष अजात जम्वाल ने कहा कि अफगानिस्तान के मौजूदा हालात के कश्मीर के संदर्भ में भारत के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहुत अहम हैं। इन पर मैं अभी ज्यादा चर्चा नहीं करुंगा, लेकिन यह जरुर कहूंगा कि कश्मीर की घरेलू सियासत मेें तालिबान का असर शुरु हाे चुका है। यही कारण है कि नेकां और पीडीपी के नेता तालिबान का नाम ले रहे हैं। 5 अगस्त 2019 के बाद नेकां और पीडीपी दोनों का कश्मीर की सियासत में वर्चस्व समाप्त हो चुका है। दोनों ही अपना वजूद बचाने की जद्दोजहद में हैं। उन्हें लगता है कि वह अगर तालिबान का नाम लेंगे तो कश्मीर में कट्टरपंथी तत्व उनके साथ जुड़ेेंगे। अलगाववादियोे के समर्थक भी उनके पीछे खड़े होंगे। इससे वे कश्मीर की सियासत में दोबारा मजबूत हो सकते हैं। इसके अलावा अगर उनके बार-बार बयान देने से कश्मीर में तालिबान की विचारधारा के समर्थक मुखर होते हैं, तो भी उनकी अहमियत दिल्ली के समक्ष बढ़ेगी और उनकी दुकानदारी चल निकलेगी।

उन्होंने कहा कि इसके अलावा हम शुरू से ही कहते आएं हैं कि यह दल सिर्फ कहने को ही लोकतंत्र और पंथनिरपेक्षता की बात करते हैं, इनका असली मकसद जम्मू कश्मीर को एक इस्लमी रियासत बनाना रहा है। यह लोकतंत्र और संविधान का नाम लेकर यहां निजाम-ए-मुस्तफा के एजेंडे को लागू करने की कोशिश में लगे हुए थे। इनका यह मंसूबा 5 अगस्त 2019 को पूरी तरह नाकाम हो गया। जाने-अनजाने तालिबान के प्रति अपना प्रेम जता, इन्होंने अपने चेहरे पर लगे नकाब को हटा दिया है।

कश्मीर मामलों के विशेषज्ञ अहमद अली फैयाज ने कहा कि मुझे महबूबा मुफ्ती के बयान से हैरानी नहीं हुई है, वह कई बार आतंकियों का पक्ष ले चुकी हैं। फारूक और उमर के बयान से हैरान जरूर हूं। डा फारूक अब्दुल्ला तो वर्ष 2002 तक मिलिटेेंट नहीं टेरेरिस्ट और आतंकी शब्द इस्तेमाल करते रहे हैं। वह आतंकियों के सख्त खिलाफ रहे हैं। उनकी पार्टी करीब चार हजार कार्यकर्ता इस्लामिक जिहादियों के हाथोें शहीद हुए हैं। उन्होंने कईँ बार आतंकियों के कैंपों पर बमबारी की वकालत की है। वह तो रुबिया सईद अपहरण कांड और आइसी-814 हाईजैक के समय आतंकियो को रिहा करने के पक्ष में भी नहीं थे। अगर वह तालिबान के साथ अच्छे संबंधोें की बात कर रहे हैं, तालिबान द्वारा अच्छे व्यवहार और इस्लाम के उसूलों के अनुरुप इस्लामिक सरकार की उम्मीद जता रहे हैं, तो यह कश्मीर के मौजूदा स्थानीय राजनीतिक परिदृश्य में खुद को प्रासंगिक साबित करने का प्रयास ही कहा जाएगा।

वरिष्ठ पत्रकार बिलाल बशीर ने कहा कि पहले अब्दुल्ला और मुफ्ती को कश्मीर में हर मसले के समाधान के लिए आटोनामी, आजादी और पाकिस्तान ही नजर आते थे। 5 अगस्त 2019 के बाद यह नारे समाप्त हो चुके हैं और ऐसे में अब इन्हें तालिबान में उम्मीद की किरण नजर आ रही है। यह सोचते हैं कि तालिबान के बहाने कश्मीर में आतंकियाेे, अलगाववादियोे और कट्टरपंथी विचारधारा के समथकाेे के बीच अपने लिए सहानुभूति पैदा की जा सकती है। इससे कश्मीर की सियासत मेे अपना एक नया आधार तैयार किया जा सकता है।  

Edited By: Vikas Abrol