जम्मू, राज्य ब्यूरो। राज्य के अस्पतालों में एंटी रेबीज इंजेक्शन कई महीनों से नर्हीं हैं। जबकि हर साल कुत्तों के काटने के हजारों मामले सामने आते हैं। मरीज मजबूर होकर स्वयं बाजार से इंजेक्शन खरीदते हैं। कई बार तो यह इंजेक्शन बाजार में भी नहीं मिलते। इसी महीने के शुरू में पूरे राज्य में एंटी रेबीज इंजेक्शन की कमी बन गई थी। अब यह इंजेक्शन बाजार में जरूर उपलब्ध है। मेडिकल कॉलेज व अन्य किसी भी अस्पताल में यह उपलब्ध नहीं है।

मेडिकल कॉलेजों से मिले आंकड़ों के अनुसार, जीएमसी अस्पताल जम्मू में चार वर्षो में पच्चीस हजार से अधिक मामले जानवरों के काटने के आए। इनमें से 22 हजार मरीज सिर्फ कुत्तों के काटने के हैं। शेष मरीज अन्य जानवरों के काटने के आए। कश्मीर में छह वर्षो में तीस हजार से अधिक लोगों को कुत्तों ने काटा है। अस्पतालों में आने वाले मरीजों में 70 फीसद ऐसे होते हैं जिन्हें बुरी तरह से कुत्तों ने काटा होता है। इन मरीजों को तुरंत इलाज की जरूरत होती है। जब वे मेडिकल कॉलेज की एंटी रेबीज सेक्शन या फिर अन्य जिला व उप जिला अस्पताल में जाते हैं तो वहां पर इंजेक्शन ही नहीं होते। इसका कारण जेके मेडिकल सप्लाई कॉरपोरेशन द्वारा इंजेक्शन की सप्लाई नहीं करना है।

बाजार से इंजेक्शन लेने को मजबूर मरीज

मरीजों को बाजार से इंजेक्शन लाने के लिए कहा जाता है। यह तब हो रहा है जब अस्पताल से मरीजों को हर दवाई देने के कई बार दावे किए हैं। मेडिकल कॉलेज में प्रीवेंटिव सोशल मेडिसीन विभाग के एचओडी डॉ. दिनेश का कहना है कि मेडिकल कॉलेज में कई महीनों से एंटी रेबीज की सप्लाई नहीं आई है। इस कारण बाजार से मरीज खुद ही इंजेक्शन लाता है। उसका इलाज होता है। जो भी पीडि़त चौबीस घंटों के भीतर वैक्सीन और सेरम ले लेता है। उसमें रेबीज की आशंका नहीं रहती है।

वैक्सीनेशन जरूरी

कुत्ते के काटने पर वैक्सीनेशन जरूरी है। यह वैक्सीनेशन महंगी है, पर इससे रेबीज से बचा जा सकता है। वैक्सीनेशन का तय शेड्यूल है। पांच बार वैक्सीनेशन होती है। इसे जीरो, तीन, सात, 14 और 28वें दिन में बांटा गया है। वैक्सीनेशन के अलावा सेरम भी दिया जाता है। सेरम पीडि़त के वजन अनुसार देते हैं। सेरम से पहले मरीज का एलर्जी टेस्ट होता है। अगर उसे एलर्जी न हो, तभी सेरम देते हैं। अस्पतालों में दोनों ही उपलब्ध नहीं है।

कभी भी हो सकता है रेबीज

डॉक्टरों के अनुसार अगर आप इलाज न करवाएं तो कभी भी रैबीज होने का खतरा रहता है। विशेष तौर पर जानवर के काटने के दस दिनों से लेकर छह महीनों तक सबसे अधिक खतरा रहता है। रेबीज के कई लक्षण हैं। मरीज को बुखार और कमजोरी महसूस होती है। खाना खाने और पानी पीने में भी परेशानी आती है। यह सीधा मरीज के नर्वस सिस्टम को प्रभावित करता है और इससे पैरालिसेस भी हो जाता है।

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Posted By: Rahul Sharma

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