श्रीनगर, नवीन नवाज। आतंकियों की नर्सरी के नाम से कुख्यात दक्षिण कश्मीर के त्राल से राज्य पुलिस में बतौर एसपीओ नियुक्त नौ युवकों ने स्थानीय मस्जिदों में नौकरी छोडऩे का एलान कर दिया है। हालांकि किसी एसपीओ ने अधिकारिक तौर पर लिखित में न इस्तीफा दिया है और न ही किसी अधिकारी ने इसकी पुष्टि की है। इन इस्तीफों को आतंकवाद के खिलाफ कश्मीरियों की हार करार नहीं दिया जा सकता, क्योंकि इस्तीफा देने वाले नौ हों या 900, कोई मायने नहीं रखता। इस्तीफा देने वालों की तुलना में आतंकवाद को कुचलने के जज्बे के साथ पुलिस में बतौर एसपीओ भर्ती होने वालों की संख्या साल-दर साल बढ़ती जा रही है।

जम्मू कश्मीर में इस समय करीब 32 हजार एसपीओ हैं, जिनका मासिक मानदेय कुछ समय पहले छह हजार रुपये हुआ है। करीब चार हजार एसपीओ राज्य पुलिस संगठन में जल्द ही भर्ती किए जाने की एक योजना अभी प्रस्तावित है। आतंकवाद को कुचलने में एसपीओ की भूमिका उल्लेखनीय है और अक्सर आतंकरोधी अभियानों में उल्लेखनीय भूमिका निभाने पर एसपीओ को राज्य पुलिस में बतौर कांस्टेबल नियमित किया जाता है।

मौजूदा साल में अब तक नौ एसपीओ आतंकी हमलों में शहीद हो चुके हैं। इनमें से चार एसपीओ को आतंकियों ने अगवा कर मौत के घाट उतारा है जबकि छह के करीब एसपीओ उस समय आतंकी हमले में बाल-बाल बचे या जख्मी हुए, जब वे ड्यूटी के बजाय अपने घर पर थे या मस्जिदों में नमाज अदा कर लौट रहे थे।

राज्य गृह विभाग के मुताबिक बीते 30 साल में राज्य में आतंकियों से लडते हुए करीब 515 एसपीओ शहीद हुए हैं। हालांकि एसपीओ को निशाना बनाना या उन्हें धमकाया जाना, कोई नया ट्रेंड नहीं है। लेकिन इसने दो साल के दौरान विशेषकर इस साल फरवरी में एसएमएचएस अस्पताल से पाकिस्तानी आतंकी नवीद अहमद जट्ट की फरारी के बाद एसपीओ पर हमलों की वारदातें तेज हुई हैं। सबसे ज्यादा हमले भी त्राल, पुलवामा और शोपियां में ही हुए हैं। इन्हीं इलाकों में ऑपरेशन आलआउट में आतंकी संगठनों को सबसे ज्यादा नुकसान हुआ हैं। स्थानीय आतंकी भी इन्हीं जिलों में सबसे ज्यादा हैं। इसलिए आतंकियों को पता है कि कौन युवक एसपीओ है और कहां उसकी कमजोरी है। सरहद पार बैठे आतंकी सरगनाओं को भी पता है कि अगर एसपीओ को निशाना बनाया जाएगा तो आतंकरोधी अभियान प्रभावित होंगे।

कश्मीर मामलों के विशेषज्ञ अहमद अली फैयाज ने कहा कि पुलिसकर्मियों पर हमला, एसपीओ के साथ मारपीट यह तो पहले भी होती रही है लेकिन जिस तरह से आतंकियों ने दो साल में सुरक्षार्किमयों के घरों में जाकर उनके परिजनों के साथ मारपीट करना शुरू किया है या एसपीओ को अगवा कर उनकी प्रताडऩा के वीडियो तैयार कर उन्हें वायरल करना शुरू किया है,वह नया है। इससे वह लोग डरेंगे जिनके परिवार का कोई सदस्य पुलिस में होगा। वह पुलिस के साथ काम करने वाले परिवार के सदस्य को नौकरी छोडऩे के लिए कहेंगे। इससे आतंकयों के दो मंसूबे पूरे होंगे। इससे लोगों में उनका डर पैदा होगा, दूसरा सुरक्षाबलों के आतंकरोधी अभियान भी प्रभावित होंगे। परिवार की खातिर कोई कुछ भी कर सकता है।

हिजबुल मुजाहिदीन के कमांडर हमाद खान ने पिछले माह की शुरुआत में त्राल में एक पोस्टर जारी एसपीओ को नौकरी छोडऩे के लिए एक सप्ताह का अल्टीमेटम दिया था। इसके बाद इस तरह के पोस्टर अनंतनाग, शोपियां, कुलगाम, पुलवामा में भी नियमित अंतराल पर आतंकियेां ने जारी कर एसपीओ को नौकरी छोडऩे के लिए कहा। इसके बाद आतंकियों ने 28 जुलाई को त्राल में एसपीओ मुदस्सर अहमद लोन को अगवा कर लिया, जिसे उन्होंने उसकी मां की अपील पर छोड़ा था। लेकिन इसके बाद उन्होंने तीन अन्य एसपीओ को निशाना बनाया।

आइजीपी कश्मीर मोहम्मद अशकूर वानी ने कहा कि राज्य पुलिस में काम करने वाला चाहे वाहन चालक हो, एसपीओ हो या डीजीपी हमेशा ही आतंकियों के निशाने पर रहते हैं। किसी भी पुलिसकर्मी पर हमला एक बड़ी सुर्खी बनता है और इसका फायदा आतंकियों को होता है। इससे राज्य पुलिस के जवानों या अधिकारियों का मनोबल नहीं टूटता और न टूटेगा। अगर आतंकी धमकियों से लोग इतना ही डरते तो दो साल में कश्मीर में करीब पांच हजार नौजवान एसपीओ नहीं बनते। यह पांच हजार युवक जबरन भर्ती नहीं किए गगए हैं, करीब 12 हजार नौजवानों ने आवेदन किया था और वह भी अगस्त 2016 में जब कुछ लोग कह रहे थे कि कश्मीर में लोग ङ्क्षहदोस्तान के खिलाफ़ खड़े हो चुके हैं, पुलिस थाने खाली हो रहे हैं। अगर किसी ने आतंकी धमकियों से डर कर इस्तीफा दिया है तो मैं उसकी पुष्टि नहीं कर सकता। लेकिन यह जरूर कहूंगा कि यह अपवाद है। इसका असर नहीं होगा।

राज्य पुलिस महानिदेशक डॉ. एसपी वैद ने कहा कि आतंकी संगठन अपने प्रमुख कमांडरों के मारे जाने से हताश हैं। वह अच्छी तरह जानते हैं कि बिना हयूमन इंटेलीजेंस उनके कमांडरों को मार गिराना, उनके ठिकानों को तबाह करना आसान नहीं है। यह ह्यïूमन इंटेलीजेंस एसपीओ से बेहतर कोई जमा नहीं कर सकता। किसी क्षेत्र विशेष में कार्यरत एसपीओ स्थानीय ही होता है। उसका स्थानीय लोगों में नेटवर्क अच्छा होता है,वह स्थानीय हालात और स्थानीय लोगों की भावनाओं केा अच्छी तरह समझता है। वह आतंकरोधी अभियानों में बहुत कारगर साबित होते हैं। आतंकी संगठन भी इसे अच्छी तरह समझते हैं।इसलिए वह एसपीओ को निशाना बना रहे हैं। उन्हें नौकरी छोडऩे के लिए मजबूर करने का हरसंभवप्रयास कर रहे हैं। लेकिन यह उनके लिए ही प्रतिरोधी साबित होगा। हम एसपीओ और पुलिसकर्मियों व उनके परिजनों की सुरक्षा को यकीनी बनाने के लिए एक विशेष रणनीति पर काम कर रहे हैं।

बीते साल कश्मीर में भर्ती हुए एसपीओ

कुपवाड़ा में 1017, श्रीनगर में 604, बडग़ाम में 571, बारामुला में 399, गांदरबल में 291 और 521 दक्षिण कश्मीर में। 

Posted By: Preeti jha