शिमला, यादवेन्द्र शर्मा। मौसम में परिवर्तन की मार हिमालयी क्षेत्र हिमाचल पर भी पड़ रही है। प्रदेश में पैदा होने वाली गेहूं के दाम उसकी पौष्टिकता के कारण ज्यादा थे। अब बर्फबारी में कमी, भूमि कटाव और मौसम में आ रही तबदीली से गेहूं की पौष्टिकता में कमी आ गई है। भूमि में नमी की मात्रा घटने और रसायनिक खाद के अत्यधिक प्रयोग से जमीन की उर्वरा शक्ति कम होने के कारण आने वाले समय में प्रदेश से गेहूं गायब हो जाएगी क्योंकि इसका उत्पादन कम होता जाएगा।

शिमला में मौसम में परिवर्तन पर आयोजित कार्यशाला में कई हैरतअंगेज तथ्य सामने आए। कार्यशाला का शुभारंभ मुख्य सचिव श्रीकांत बाल्दी ने किया। विज्ञान एवं पर्यावरण केंद्र (सीएसई) के वरिष्ठ निदेशक एवं मौसम में परिवर्तन पर अध्यनरत रिचर्ड महापात्रा ने कहा कि बर्फबारी में लगातार आ रही कमी का परिणाम यह होने वाला है कि हिमाचल में अभी जहां सेब उत्पादन हो रहा है, वहां अनार की पैदावार होगी। कुछ क्षेत्रों में तो ऐसा होना शुरू भी हो गया है। मौसम गर्म होने के कारण कई क्षेत्रों में सेब को पूरे चिलिंग आवर नहीं मिल पा रहे हैं। इसीलिए ऐसे क्षेत्रों में अनार की पैदावार हो रही है, जो गर्म इलाकों में होता है।

इसका कारण पेड़ों का लगातार कटान, विकास के नाम पर पर्यावरण से हो रहा अंधाधुंध खिलवाड़ और कीटनाशकों व रासायनिक खाद का इस्तेमाल भी है। वर्ष 2022 तक देशभर के किसानों की आय को दोगुना करने का लक्ष्य है। जिस तरह से मौसम में परिवर्तन आ रहा है और ग्लोबल वार्मिंग का प्रभाव हो रहा है, उस आधार पर किसानों की आय वर्तमान आय से 16 से 30 फीसद तक गिरेगी। भारत सरकार के आर्थिक सर्वेक्षण में भी यह बात सामने आई है।

पोषक तत्वों में गिरावट

रिचर्ड महापात्रा ने कहा कि हिमाचली उत्पादों के पोषक तत्वों में लगातार गिरावट आ रही है। इसका सबसे बड़ा कारण भूमि कटाव है, जो बर्फबारी और बारिश के बदलते स्वरूप के कारण हो रहा है। बर्फबारी में कमी और एकदम से बहुत अधिक बारिश पर्यावरण से हो रहे छेड़छाड़ का परिणाम है। 

हर दस साल में एक ठंडी रात

एक ठंडा दिन कम बकौल रिचर्ड महापात्रा, हर दस वर्षों में एक ठंडी रात और एक ठंडा दिन कम होकर गर्मी  के दिनों में इजाफा हो रहा है। विश्वभर के वैज्ञानिकों की नजर हिमालयी क्षेत्रों पर है। इसका कारण यह है कि थोड़ी सी भी हलचल पूरे विश्व को प्रभावित करती है। भूमि में नमी की मात्रा में लगातार कमी आ रही है। यह कमी भूमि की उर्वरा शक्ति को प्रभावित कर बंजर भूमि बढ़ा रही है।

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Posted By: Babita kashyap

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