शिमला, जेएनएन। World Hindi Day 2020 आज विश्व हिंदी दिवस है। इस उपलक्ष्य पर देश में कई बड़े कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। बावजूद इसके आज हिंदी भारत में ही नकारी जा रही है। हिंदी भले ही बोलचाल में कम नहीं हो, लेकिन कामकाज की भाषा आज भी अंग्रेजी ही बनकर रह गई है। इसका कारण हमारी खुद की मानसिकता है। लोग आज भी हिंदी की बजाय अंग्रेजी में ही कामकाज को बढ़ावा देते हैं। जब तक हम खुद से बदलाव की शुरुआत नहीं करते तब तक हिंदी अनदेखी का शिकार होती रहेगी। हिंदी भाषा के अस्तित्व को बचाने के लिए इसके व्यापक प्रचार प्रसार से ज्यादा खुद में बदलाव लाकर हिंदी को बढ़ावा देने की पहल करनी होगी। विश्व हिंदी दिवस के उपलक्ष्य पर दैनिक जागरण ने कुछ बुद्धिजीवियों के विचार जाने, प्रस्तुत हैं मुख्य अंश : 

खतरे में हिंदी का अस्तित्व, जिम्मेदार हम खुद : अजय श्रीवास्तव

हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय में पत्रकारिता विभाग के प्रोफेसर अजय श्रीवास्तव ने कहा कि हिंदी का अस्तित्व खतरे में है। इसके के लिए जिम्मेदार हिंदी भाषी लोग यानी हम खुद हैं। हिंदी भाषा की तरफ हमारा ध्यान ही नहीं है। यह आज दोयम दर्जे की भाषा बनकर रह गई है। मॉरीशस में पिछले साल हुए विश्व हिंदी दिवस में भाग लेने का मौका मिला था। वहां पर देखा कि लोगों का हिंदी भाषा के प्रति प्रेम हमारे से कहीं ज्यादा है। हिंदी भाषा का प्रचलन खत्म न हो इसके लिए वहां पर विशेष कक्षाएं लगाई जा रही हैं। हमारे देश से जो लोग इसमें भाग लेने के लिए गए थे वह अंग्रेजी में बात कर रहे थे। यह हमारी मानसिकता को दिखाता है। हमारी मानसिकता ये बन गई है कि विदेशों में यदि हम अंग्रेजी में बात नहीं करेंगे तो हमारा सम्मान कम हो जाएगा। हाल ही में बेंगलुरु घूमने गया था। वहां पर मॉल में अंग्रेजी के अलावा अरबी भाषा में भी साइन बोर्ड लिखा था। यह इसलिए क्योंकि वहां अरबी लोग खरीदारी के लिए आते हैं। हिंदी भाषा में कोई भी बोर्ड वहां नहीं था। हिंदी भाषा के लिए हमें खुद काम करना होगा।

अपनी भाषा में बातचीत व काम करना ही राष्ट्रीयता : प्रो. सरस्वती भल्ला

हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग की अध्यक्ष प्रो. सरस्वती भल्ला का कहना है कि अपनी भाषा में बोलचाल और कामकाज करना ही राष्ट्रीयता है। हिंदी के प्रति हमें अपनी मानसिकता को बदलना होगा। बातचीत करने के अलावा कामकाज में इस भाषा को अपनाना होगा तभी इसका प्रचार और प्रसार होगा। वैश्विक स्तर हिंदी ने अपनी विशेष पहचान कुछ समय में बनाई है। भारत में कई विदेशी कंपनियां कारोबार के लिए आती हैं, इसलिए उन्होंने हिंदी भाषा को अपनाया है। भाषा केवल संपर्क का माध्यम नहीं होती। हमें इसकी संस्कृति को भी अपना पड़ता है। भाषा के कई प्रकार हैं साहित्यिक भाषा, जनमानस की भाषा और व्यापार की भाषा। वैश्विक स्तर की यदि बात हम करते हैं तो हिंदी व्यापार की भाषा बनती जा रही है। व्यापाक प्रचार-प्रसार के लिए हिंदी को सही मायने में कार्यान्वित करना होगा। अपनी मासनिकता को बदलना होगा। लोग आज भी मानसिक गुलामी का शिकार है। इसलिए वे हिंदी भाषा बोलने में खुद को असहज महसूस करते हैं, जबकि वे सोचते और समझते हिंदी में ही हैं।

धर्म संस्कृति को समझना है, तो हिंदी को अपनाना होगा : अनुराग पराशर

हिमाचल प्रदेश बिजली बोर्ड के संयुक्त निदेशक (जनसंपर्क) अनुराग पराशर का कहना है कि हिंदी हमारी समझ की भाषा है। प्रदेश का कोई भी व्यक्ति पहाड़ी के साथ-साथ हिंदी से अछूता नहीं है। हिंदी जनमानस की भाषा है और हर प्रकार की सूचना प्रबंधन के साथ-साथ सरकारी नीतियों का सही मायने में प्रसार प्रचार हिंदी में पूर्णतया न होने की वजह से पूर्ण रूप से सफल नहीं हो पाता। अंग्रेजी से परहेज न होते हुए प्रदेशवासी हिंदी में ही सोचते हैं जो विचारों की अभिव्यक्ति के लिए सबसे आवश्यक है। यह मैंने प्रदेश के कोने-कोने में लोगों के विचार लेकर महसूस किया है। कानूनी दावपेचों से लेकर आम सोच को अंग्रेजी का प्रचलन जन-जन तक मुश्किल पैदा कर रहा है। हिमाचल में जनमानस की भाषा हिंदी ही होनी चाहिए। सभी विषयों का ज्ञान हिंदी में दिया जा सकता है। समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर को यदि एक बार फिर से शांति के लिए दोहराना है तो हिंदी अपनानी होगी। इसमें कोई शक नहीं है कि अंग्रेजी को अंतरराष्ट्रीय भाषा का दर्जा प्राप्त है और अंग्रेजी साहित्य का अपना एक स्थान है, परन्तु भारत की धर्म संस्कृति को समझना है, जो प्रमाणिक है तो हिंदी को अपनाना होगा, खासकर हिमाचल में। आरंभ में मुश्किल होगी, लेकिन मंजिल दूर नहीं होगी। 

प्रशासन व रोजगार की भाषा बने हिंदी : आत्मारंजन

साहित्यकार आत्मारंजन का कहना है कि हिंदी का वैश्विक विस्तार अपनी सहज गति में हो रहा है। इसके और विस्तार की भी अच्छी संभावनाएं हैं, लेकिन भारत में खासतौर पर सरकारी तंत्र में इसकी स्थिति बहुत बेहतर नहीं है। भाषा को विस्तार और सम्मान उसको बोलने वालों के व्यवहार से ही मिलता है। हिंदी भाषा को विस्तार देने में हिंदी फिल्मों और गीतों ने अहम भूमिका निभाई। हिंदी बोलने के क्षेत्रीय लहजे भी विकसित हुए। ऐसी ही भूमिका बाजार भी निभा रहा है। हिंदी जन की भाषा तो बनी, लेकिन शासन प्रशासन की भाषा अभी भी मुख्य रूप से अंग्रेजी ही है। ऐसा न हो पाने और इसके विरोध के राजनीतिक कारण भी हैं और सांस्कृतिक भी।

साथ ही बड़ी बात  यह भी कि हर दौर में शासक और शासित की भाषा अक्सर एक नहीं रही है। हिंदी को उसका असली सम्मान व हक तभी मिल सकता है यदि हिंदी रोजगार की भाषा बने। लेकिन ऐसा होने से समाज में प्रभुजन का वर्चस्व टूटता है। जो वह कभी नहीं चाहेगा यही कारण है कि समाज के मुट्ठी भर लोग आजादी के इतने वर्ष बीत जाने के बाद भी हिंदी प्रेम का भरपूर आडंबर करने के बावजूद इसे रोजगारमूलक भाषा नहीं बनने देना चाहते। इस दिशा में कुछ बुनियादी कदम उठाए जाने की आवश्यकता है।

भारत में सिर्फ सत्ता हासिल करने की भाषा बनी हिंदी : डॉ. भवानी सिंह 

हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग में सीनियर असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. भवानी सिंह का कहना है कि वैश्विक स्तर पर हिंदी ने अपनी विशेष पहचान बनाई है। हिंदी साहित्य, जनसंचार के माध्यम से इसका व्यापक प्रचार प्रसार हुआ है। हिंदी विश्व व्यापार की भाषा भी बनी है। बहुउद्देश्यीय कंपनियां जो भारत में व्यापार कर रही हैं उन्हें अपना उत्पाद बेचना है इसलिए उन्होंने हिंदी भाषा को अपनाया है। भारत में यह भाषा महज सत्ता हासिल करने की भाषा बनकर रह गई है।

नेता बड़े-बड़े भाषण हिंदी में देते हैं, लेकिन कामकाज अंग्रेजी में ही किया जाता है। हिंदी भाषा सही मायने में तभी राष्ट्रभाषा बन पाएगी जब ज्ञान, विज्ञान, अध्ययन अध्यापन का काम हम हिंदी में करेंगे। इसके लिए हमें हिंदी में कामकाज करना होगा। हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय की बात करें तो यहां पर हर साल बच्चे हिंदी विभाग में दाखिला लेने में खासी रुचि दिखाते हैं। 50 सीटों के लिए 800 से 1100 आवेदन आते हैं।

हिंदी को राष्ट्रभाषा बनने में अभी समय : सुदर्शन वशिष्ठ

साहित्यकार सुदर्शन वशिष्ठ ने बताया कि हिंदी संवैधानिक तौर पर हमारी राजभाषा तो है, लेकिन अभी तक राष्ट्रभाषा नहीं बन पाई है। देश के विभिन्न राज्यों में उनके प्रदेश की भाषाएं अधिकतर बोली, समझी और व्यवहार में लाई जाती हैं। हर प्रदेश की अपनी भाषा उनके विभागीय कामों में उपयोग में लाई जाती है। देश में करीब 22 भाषाएं हैं, जिनमें हिंदी प्रमुख है, लेकिन हिंदी को अंग्रेजी की तरह पूरे देश में नहीं समझा जाता। दक्षिण भारत और पूर्वी भारत के कई प्रांतों में अभी भी लोग हिंदी बोलना व लिखना नहीं जानते हैं। इससे प्रतीत होता है कि हिंदी पूरे देश में पूरी तरह व्यापक नहीं है। जिस प्रकार हमारा राष्ट्रध्वज एक है वैसे ही हमारी राष्ट्रभाषा एक नहीं है। अंग्रेजी की तरह हिंदी भी विश्व में जानी जाए। हालांकि हिंदी सिनेमा, टेलीविजन और अन्य संचार के माध्यम से हिंदी को अन्य देशों भी जाना जा रहा है। चीन, रूस, अमेरिका सहित अन्य कई देशों के विश्वविद्यालयों में हिंदी पढ़ाना शुरू किया गया है जो एक सुखद अहसास है।

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Posted By: Babita kashyap

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