प्रकाश भारद्वाज, शिमला

विधानसभा के मानसून सत्र में विपक्षी कांग्रेस ने सरकार को घेरने में कोई कसर नहीं छोड़ी लेकिन मुख्यमंत्री और मंत्रियों ने उसके हर सवाल का तर्को सहित जवाब दिया। हालांकि सरकार और अफसरशाही में तालमेल की कमी जगजाहिर होकर विधानसभा पहुंच गई। धर्मशाला में प्रस्तावित ग्लोबल इन्वेस्टर मीट में पर्यटन विभाग की खामी इसका उदाहरण रही। इस मसले पर सरकार को बैकफुट पर भी आना पड़ा।

मानसून सत्र की शुरुआत में कांग्रेस ने जैसे चाहा, वैसी सियासत कर मुद्दों को उछाला। ऊना शराब प्रकरण से कांग्रेस ने राजनीतिक पारा इतना बढ़ा दिया कि सरकार को उसकी शर्ते माननी पड़ी। इस मामले की जांच कर रहे आइपीएस अधिकारी (पुलिस अधीक्षक) को प्रशिक्षण पर भेजना पड़ा। हालांकि मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर पहली बार तीखे तेवर में नजर आए। यहां तक कहा कि शराब माफिया को बचाने के लिए पूरा विपक्ष एक साथ खड़ा हो गया है। इस धार को आगे बढ़ाने की उम्मीद नए विधायकों से थी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। आशा थी कि पहली बार चुनकर आए विधायक राजनीतिक बहस करने में पारंगत हो चुके होंगे। राकेश पठानिया तो हर बार खड़े हुए, मगर दूसरे विधायकों से भी कांग्रेस को घेरने की उम्मीद थी। मंत्रियों में विपिन परमार, बिक्रम सिंह ठाकुर और सुरेश भारद्वाज ने मोर्चा संभाले रखा।

आउटसोर्स कर्मियों के लिए सरकार किसी प्रकार की कोई नीति नहीं बनाएगी। इस तरह के सवाल उठाकर कांग्रेस ने सरकार पर कई तरह के सवाल खड़े किए। रोजाना प्रश्नकाल के दौरान सार्थक चर्चा हुई। खनन माफिया पर नकेल कसने के लिए सरकार ने प्रतिबद्धता दिखाई और प्रदेशव्यापी अभियान चलाने का एलान किया। धारा-118 का मुद्दा सुलगा लेकिन मुख्यमंत्री ने कांग्रेस की मंशा पर पानी डाल दिया। उन्होंने कांग्रेस को आईना दिखाया कि सत्ता में रहते उसने एक्ट में पांच बार संशोधन क्यों किया। मौजूदा भाजपा सरकार प्रदेश के हितों को किसी प्रकार से खंडित नहीं होने देगी। धारा-118 को ऑनलाइन करसरकार इसके रहस्य को हमेशा के लिए खत्म करेगी।

जबरन धर्मातरण रोकने के लिए कांग्रेस पहल करती रही थी। लेकिन जयराम ने इसमें सजा का कड़ा प्रावधान कर साबित कर दिया कि भाजपा इसके लिए गंभीर है। कांग्रेस ने 2006 में इसके खिलाफ कानून बनाया था मगर जयराम सरकार ने धर्म की स्वतंत्रता विधेयक लाकर वाहवाही लूट ली। लोक सेवा गारंटी कानून 2011 में पास हो गया था और इस बीच दो सरकारें भी निकल गई। किसी भी सरकार ने इसकी अधिसूचना जारी नहीं की। इस प्रकार की चूक को स्वीकारते हुए सरकार ने संशोधन किया। सत्र के दौरान 20 ऐसे कानून खत्म कर दिए जो इस्तेमाल से बाहर हो गए थे। इसके अलावा नियमों के बिना चल रहे हिमाचल प्रदेश खाद्य सुरक्षा अधिनियम-2013 को संशोधित कर नियम बनाने का रास्ता निकाला। कृषि उपज से जुड़े हिमाचल प्रदेश एपीएमसी प्रमोशन फेसिलिटेशन अधिनियम-2005 सदस्यों के आग्रह पर प्रवर समिति को भेजा। अदालतों में काम करने वाले वकीलों के लिए संशोधन अधिनियम पारित कर उनकी आर्थिक सहायता का प्रावधान किया। कांग्रेस में भीतर चल रही राजनीति के बावजूद नेता प्रतिपक्ष मुकेश अग्निहोत्री ज्यादातर सबको साथ लेकर चलने में सफल हुए। विपक्ष में नेतृत्व की जंग में कई नेता स्वयं को भविष्य का अगुआ साबित करने की कोशिश करते रहे।

Posted By: Jagran

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