जागरण संवाददाता, शिमला : राजधानी शिमला में हरतालिका तीज त्योहार के लिए महिलाओं में खासा उत्साह रहा। इस दौरान मंदिरों में महिलाओं ने विशेष पूजा-अर्चना की। शाम करीब छह बजे मंदिरों में जाकर पार्वती व शिवशंकर की पूजा की। महिलाओं व कन्याओं ने दिनभर उपवास रखा। व्रतधारी महिलाओं ने नए वस्त्र धारण कर मिट्टी से बनी शिव-पार्वती की मूर्ति का विधि-विधान से पूजन किया व हरतालिका तीज की कथा सुनी। माता पार्वती को सुहागिनों ने सुहाग का सामान भी चढ़ाया। पंडित डॉ. मस्तराम शर्मा का कहना है कि जिन महिलाओं व कन्याओं ने उपवास रखा है, वह वीरवार को सूर्योदय के बाद ही अपना व्रत तोड़ें। उनका कहना है कि जिन कन्याओं का विवाह नहीं हुआ है, उन्हें इस व्रत रखने से मनचाहा वर मिलता है। उनके लिए यह व्रत काफी फलदायी होता है।

क्यों मनाया जाता है हरतालिका तीज

विद्वानों के अनुसार इस व्रत को सबसे पहले गिरिराज हिमालय की पुत्री पार्वती ने किया था, जिसके फलस्वरूप भगवान शंकर उन्हें पति के रूप में प्राप्त हुए। इच्छित वर प्राप्ति के लिए पार्वती ने तपस्या की। पार्वती माता ने कंदराओं के भीतर शिवजी की रेत की मूर्ति बनाकर उनका पूजन किया। उस दिन भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया थी। माता ने निर्जल, निराहर व्रत करते हुए दिन-रात शिव नाम मंत्र का जाप किया। पार्वती की सच्ची भक्ति एवं संकल्प की दृढ़ता से प्रसन्न होकर सदाशिव प्रकट हो गए और उन्होंने उमा को पत्नी के रूप में स्वीकार कर लिया।

Posted By: Jagran