IGMC शिमला में 202 करोड़ की दवाएं सरकारी रेट से 3621 प्रतिशत तक महंगी खरीदीं, प्रधान महालेखाकार ऑडिट जांच में खुले राज
प्रधान महालेखाकार शिमला की ऑडिट जांच में आईजीएमसी शिमला में 202.94 करोड़ रुपये की दवाओं और सर्जिकल सामान की खरीद पर सवाल उठे हैं।

आईजीएमसी अस्पताल शिमला का परिसर। जागरण आर्काइव
HighLights
202.94 करोड़ की दवा खरीद पर ऑडिट ने सवाल उठाए।
सरकारी दरों से 3621% तक अधिक कीमत पर दवाएं खरीदीं।
99.06% ब्रांडेड दवाएं खरीदी गईं, जेनेरिक की अनदेखी।
चैतन्य ठाकुर, शिमला। हिमाचल प्रदेश के आईजीएमसी अस्पताल शिमला में वर्ष 2019-20 से 2024-25 के बीच 202.94 करोड़ रुपये की दवाओं और सर्जिकल सामान की खरीद को लेकर ऑडिट ने कई सवाल उठाए हैं। प्रधान महालेखाकार शिमला की ऑडिट जांच में कंपनियों के चयन, दवाओं की कीमत और खरीद के तरीके को लेकर आइजीएमसी प्रशासन से जवाब मांगा है।
ऑडिट के अनुसार, वर्ष 2019 से आइजीएमसी प्रबंधन ने दवाओं और सर्जिकल सामान की सप्लाई के लिए 83 कंपनियों व फर्मों से समझौते किए। अलग-अलग वर्षों में ऐसी कंपनियों की संख्या 63 से 79 के बीच रही।
ऑडिट को यह बताने वाले पर्याप्त रिकार्ड नहीं मिले कि इन कंपनियों को चुनने से पहले दूसरी कंपनियों से रेट मंगाए थे या नहीं। अलग-अलग रेट की तुलना की थी या नहीं। इस कारण खरीद प्रक्रिया पर सवाल उठाए गए हैं।
कंपनियों से आवेदन की प्रक्रिया क्यों नहीं अपनाई
आइजीएमसी ने वर्ष 2014 में दवाओं, कैंसर की दवाओं, सर्जिकल सामान और शरीर में लगाए जाने वाले उपकरणों की सप्लाई के लिए कंपनियों से आवेदन मांगे थे। यह सूची एक जून 2014 से 31 मई 2015 तक लागू थी और नई सूची बनने तक आगे बढ़ाई जा सकती थी। वर्ष 2019 में हड्डी, हृदय और न्यूरोसर्जरी से जुड़े उपकरणों की खरीद के लिए प्रक्रिया अपनाई गई थी। लेकिन दवाओं और हृदय रोग, पेट के रोग तथा आंखों से जुड़े अन्य उपकरणों की खरीद के लिए ऐसी प्रक्रिया क्यों नहीं अपनाई गई, इसका भी जवाब मांगा है।
वास्तविक सरकारी नुकसान कितना
रिपोर्ट में बताया है कि अगर कुल खरीद में सिर्फ पांच प्रतिशत ज्यादा भुगतान हुआ हो तो यह रकम करीब 10.14 करोड़ रुपये बनती है। 10 प्रतिशत का अंतर होने पर यह करीब 20.29 करोड़ रुपये होगी। हालांकि ऑडिट ने इसे वास्तविक सरकारी नुकसान नहीं बताया है।
99.06 प्रतिशत ब्रांडेड दवाएं खरीदीं
छह वर्ष में 202.94 करोड़ की कुल खरीद में केवल 1.90 करोड़ रुपये यानी 0.94 प्रतिशत जेनेरिक दवाएं खरीदी गईं। इसके मुकाबले 99.06 प्रतिशत खरीद ब्रांडेड दवाओं की हुई। आडिट ने डाक्टरों द्वारा दवाएं उनके सामान्य नाम से लिखे जाने और इसकी निगरानी के लिए पर्चियों की जांच की व्यवस्था के बारे में भी जानकारी मांगी है।
सरकारी दर से ज्यादा
ऑडिट ने जनऔषधि दुकान के रिकार्ड और सरकारी दरों से 14 दवाओं और इंजेक्शन की कीमतों की तुलना की। इसमें खरीद दरें सरकारी दर से 29.14 से 3,621 प्रतिशत तक ज्यादा मिलीं। एटोरवास्टेटिन 20 मिलीग्राम की कीमत में 3621, एटोरवास्टेटिन 10 और 40 मिलीग्राम में 756 से 2275, सलाइन नेजल साल्यूशन में 879, पैंटोप्राजोल इंजेक्शन में 510 और लेवोफ्लाक्सासिन इंजेक्शन में 462 प्रतिशत तक अधिक दर पाई गई।
एनोक्सापैरिन में 98 से 137, एल्ब्यूमिन में 181 और ट्रास्टुजुमैब में 145.39 प्रतिशत तक अधिक कीमत दर्ज की गई। वर्ष 2023 में हिमाचल प्रदेश मेडिकल सर्विसेज कारपोरेशन लिमिटेड को राज्य की दवाएं खरीदने वाली प्रमुख एजेंसी बनाया था। इसके बावजूद आइजीएमसी में दवाओं और शरीर में लगाए जाने वाले उपकरणों की खरीद उसके माध्यम से नहीं की गई।
उन्हें इस बारे में जानकारी नहीं है। समय-समय पर जितने भी आडिट पैरा लगते हैं उनके जवाब दे दिए जाते हैं। मौजूदा समय में कोई भी उत्तर लंबित नहीं है।
-डा. राहुल राव, वरिष्ठ चिकित्सा अधीक्षक आइजीएमसी।
यह भी पढ़ें: हिमाचल में 27 वर्ष बाद शुरू हो रही लॉटरी पर घमासान, CM सुक्खू बोले- भाग्य का खेल; किसी पर खरीदने की बाध्यता नहीं
