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भर्ती नियमों में बदलाव नियोक्ता का विशेषाधिकार, हिमाचल हाई कोर्ट ने आयु सीमा 30 वर्ष करने के मामले में दिया फैसला

By Rohit Nagpal Edited By: Rajesh Sharma
Published: Sun, 04 Oct 2026 06:37 AM (IST)

हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भर्ती नियमों में संशोधन और पात्रता मानदंड तय करना नियोक्ता का विशेषाधिकार है।

हिमचल प्रदेश हाई कोर्ट का परिसर। जागरण आर्काइव

हिमचल प्रदेश हाई कोर्ट का परिसर। जागरण आर्काइव

HighLights

  1. भर्ती नियमों में संशोधन नियोक्ता का विशेषाधिकार, कोर्ट ने कहा।

  2. जूनियर टी-मेट की आयु सीमा 45 से 30 वर्ष करना वैध।

  3. फील्ड कार्य की प्रकृति के कारण युवा कर्मचारियों की आवश्यकता।

विधि संवाददाता, शिमला। हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया कि भर्ती नियमों को बनाना, उनमें संशोधन करना और पात्रता मानदंड तय करना पूरी तरह से नियोक्ता का विशेषाधिकार और नीतिगत मामला है। न्यायाधीश अजय मोहन गोयल और न्यायाधीश योगेश जसवाल की खंडपीठ ने हिमाचल प्रदेश राज्य बिजली बोर्ड में जूनियर टी-मेट (ऑपरेशन विंग) के पद पर सीधी भर्ती की अधिकतम आयु सीमा को 45 वर्ष से घटाकर 30 वर्ष करने के निर्णय को पूरी तरह सही ठहराया है और इस संबंध में दायर याचिका को खारिज कर दिया है।

बिजली बोर्ड ने 16 जुलाई 2014 को एक अधिसूचना जारी कर जूनियर टी-मेट के पद के लिए सीधी भर्ती की ऊपरी आयु सीमा को 18-45 वर्ष से घटाकर 18-30 वर्ष कर दिया था।

चिकाकर्ताओं ने इस फैसले को भेदभावपूर्ण, मनमाना और संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन बताते हुए कोर्ट में चुनौती दी थी। उनका तर्क था कि इस संशोधन के कारण वे ओवरएज (अपात्र) हो गए हैं, जिससे उनके नियुक्ति के अधिकार का हनन हुआ है।

आयु सीमा तर्कसंगत 

बिजली बोर्ड की ओर से बताया गया कि यह निर्णय सरकार और सर्विस कमेटी की उचित सलाह व बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स की मंजूरी के बाद जनहित में लिया गया था। उन्होंने कोर्ट को बताया कि जूनियर टी-मेट का काम मुख्य रूप से फील्ड का होता है, जिसमें ऊंचे खंभों पर चढ़ना जैसे कठिन कार्य शामिल हैं। इसके लिए शैक्षणिक योग्यता के साथ-साथ फुर्तीले और युवाओं की जरूरत होती है, जिसके लिए 30 वर्ष की आयु सीमा तर्कसंगत है।

कोर्ट ने बताया नीतिगत फैसला

कोर्ट ने कहा कि किसी पद के लिए आयु सीमा तय करना या उसमें छूट देना पूरी तरह से सरकार या नियोक्ता का नीतिगत फैसला है। इसमें अदालतें तब तक हस्तक्षेप नहीं कर सकतीं जब तक कि कोई दुर्भावना या प्रक्रियात्मक खामी न हो। कोर्ट ने साफ किया कि सिर्फ इसलिए कि किसी संशोधन से याचिकाकर्ताओं को आवेदन करने का मौका नहीं मिल रहा, उस नियम को मनमाना या असंवैधानिक नहीं ठहराया जा सकता।

रिकॉर्ड देखने के बाद कोर्ट ने पाया कि बोर्ड ने आयु सीमा घटाने के लिए पूरी कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रिया का पालन किया है और इसके पीछे एक ठोस वजह (फील्ड जॉब की प्रकृति) मौजूद है। अदालत ने याचिका में कोई मेरिट न पाते हुए इसे खारिज कर दिया और बोर्ड के संसोधित नियमों को वैध माना।

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