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'तलाक के बाद स्त्रीधन की वापसी का दावा निरंतर अपराध नहीं', हिमाचल हाई कोर्ट ने समयसीमा बीतने पर खारिज किया केस

By Rohit Sharma Edited By: Rajesh Sharma
Published: Wed, 28 Oct 2026 06:33 AM (IST)

हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि तलाक के बाद स्त्रीधन की वापसी का दावा 'निरंतर अपराध' नहीं ...और पढ़ें

हिमाचल हाई कोर्ट ने पति-पत्नी के केस में अहम फैसला सुनाया है।

हिमाचल हाई कोर्ट ने पति-पत्नी के केस में अहम फैसला सुनाया है।

HighLights

  1. तलाक के बाद स्त्रीधन रोकना निरंतर अपराध नहीं।

  2. स्त्रीधन वापसी की शिकायत तलाक के 3 साल में करें।

  3. हिमाचल हाई कोर्ट ने पूर्व पति को राहत दी।

विधि संवाददाता, शिमला। हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि तलाक के बाद पति या उसके परिवार के पास स्त्रीधन का बकाया रहना एक 'निरंतर अपराध' नहीं माना जा सकता। अदालत ने कहा कि कानूनी रूप से पति-पत्नी का रिश्ता खत्म होने के बाद पत्नी को तीन साल की निर्धारित समयसीमा के भीतर ही स्त्रीधन की वापसी के लिए आपराधिक शिकायत दर्ज करवानी होगी। 

यह फैसला न्यायाधीश चिराग भानु सिंह ने आरोपित पूर्व पति द्वारा दायर आपराधिक पुनरीक्षण याचिका को स्वीकार करते हुए सुनाया। कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट द्वारा जारी समन और आरोप पत्र सहित पूरी आपराधिक कार्रवाई को रद कर दिया है।

एक साल बाद ही हो गए थे अलग

पीड़ित महिला और याचिकाकर्ता की शादी साल 2007 में हुई थी, लेकिन विवाद के कारण वे 2008 से ही अलग रहने लगे थे। पूर्व पति ने क्रूरता और परित्याग के आधार पर अदालत से नौ अक्टूबर 2012 को तलाक की एकतरफा डिक्री हासिल कर ली थी। तलाक के करीब पांच साल बाद महिला ने 19 जुलाई 2017 को शिमला के ट्रायल कोर्ट में आरोप लगाया कि उसका स्त्रीधन अभी भी पूर्व पति के पास है।

हाई कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद स्पष्ट किया कि न्यायिक अलगाव में पति-पत्नी का कानूनी रिश्ता बना रहता है, इसलिए वहां स्त्रीधन रोकना एक निरंतर अपराध माना जा सकता है। लेकिन तलाक की डिक्री मिलते ही दोनों का कानूनी रिश्ता टूट जाता है। 

तलाक के 5 साल बाद दर्ज की थी शिकायत

रिश्ता खत्म होने के बाद धारा 406 और 506 के तहत अधिकतम तीन साल की सजा का प्रविधान है। इसलिए सीआरपीसी की धारा 468 के तहत संज्ञान लेने की अवधि भी तीन वर्ष ही होगी। चूंकि यह शिकायत तलाक के पांच साल बाद दर्ज की गई थी, इसलिए कानूनन यह विचारणीय नहीं है। अदालत ने कहा कि महिला पूर्व में भरण-पोषण के लिए सिविल सूट और अन्य याचिकाएं दायर कर चुकी थी, लेकिन उसने तब कभी स्त्रीधन का दावा नहीं किया।

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