'नियम ताक पर रख चहेतों को मलाईदार पदों पर नहीं बनाए रख सकते', हिमाचल हाई कोर्ट ने बदला सरकार का फैसला
हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने लोक निर्माण विभाग के इंजीनियर-इन-चीफ नरेंद्र पाल सिंह के छह माह के सेवाविस्तार को अवैध करार देते हुए रद्द कर दिया है।

हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविन्द्र सिंह सुक्खू। जागरण आर्काइव
HighLights
PWD इंजीनियर-इन-चीफ का सेवाविस्तार हाई कोर्ट ने रद्द किया।
नियमों के खिलाफ चहेतों को पद पर बनाए रखना गलत।
योग्य अधिकारियों की पदोन्नति पर बुरा असर पड़ता है।
विधि संवाददाता, शिमला। हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने लोक निर्माण विभाग के इंजीनियर-इन-चीफ नरेंद्र पाल सिंह को दिए छह माह के सेवाविस्तार को अवैध ठहराते हुए रद कर दिया है। न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर और न्यायाधीश रंजन शर्मा की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि नियमों को ताक पर रखकर चहेतों को मलाईदार पदों पर बनाए रखने की 'स्पाइल सिस्टम' परंपरा को कतई बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
योग्य अधिकारियों की पदोन्नति प्रभावित
मुख्य अभियंता नरेंद्र पाल सिंह चौहान द्वारा दायर याचिका को स्वीकार करते हुए कोर्ट ने कहा कि किसी एक चहेते अधिकारी को सेवानिवृत्ति के बाद भी पद पर बनाए रखने से नीचे के छह से सात योग्य अधिकारियों की पदोन्नति प्रभावित होती है। इससे पूरे प्रशासनिक ढांचे और कर्मचारियों के मनोबल पर बुरा असर पड़ता है।
यह मनमाना और नियमों के खिलाफ
नियमों के मुताबिक सेवाविस्तार का प्रस्ताव विभाग के निचले स्तर से उठना चाहिए था, लेकिन इस मामले में मुख्यमंत्री कार्यालय के निर्देश पर फाइल ऊपर से नीचे की तरफ चली, जोकि मनमाना और नियमों के खिलाफ है।
दलील- कई योग्य अधिकारी
तत्कालीन इंजीनियर-इन-चीफ को सेवाविस्तार देने के लिए यह दलील दी थी कि विभाग के पास कोई और उपयुक्त उत्तराधिकारी नहीं है। जबकि हकीकत में याचिकाकर्ता (जो एमटेक हैं) और तीन अन्य मुख्य अभियंता इस पद के लिए योग्य और कतार में थे।
सरकार अपना ही फैसला भूल गई
सरकार ने खुद सात अप्रैल 2026 को लिखित निर्देश जारी किए थे कि अब किसी भी सेवानिवृत्त कर्मचारी को सेवाविस्तार या पुनर्रोजगार नहीं दिया जाएगा। सरकार ने अपने ही इस फैसले को इस मामले में भुला दिया। हाई कोर्ट ने अपने पुराने फैसलों और हैंडबुक आफ पर्सनेल मैटर्स का हवाला देते हुए साफ किया कि सेवाविस्तार केवल 'अत्यंत दुर्लभ और असाधारण परिस्थितियों' में ही जनहित को देखकर दिया जा सकता है, न कि किसी राजनीतिक या व्यक्तिगत प्रभाव के कारण।
इस मामले में प्रक्रिया का पालन न होने और 'इंटीग्रिटी सर्टिफिकेट' की कमी के चलते अदालत ने इस सेवाविस्तार को असंवैधानिक मानते हुए खारिज कर दिया।
