विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

'सरकार भेदभाव नहीं कर सकती', हिमाचल हाई कोर्ट ने कार्यभार संभालने के दिन से प्रिंसिपलों को भुगतान के दिए निर्देश

By Digital Desk Edited By: Rajesh Sharma
Published: Wed, 23 Sep 2026 11:34 AM (IST)

हिमाचल हाई कोर्ट ने प्रवक्ताओं को प्रिंसिपल पद का कार्यभार सौंपने के बावजूद उच्च वेतनमान न देने को अवैध और भेदभावपूर्ण करार दिया है।

हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट का शिमला स्थित परिसर। जागरण आर्काइव

हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट का शिमला स्थित परिसर। जागरण आर्काइव

HighLights

  1. प्रवक्ताओं को प्रिंसिपल पद का उच्च वेतनमान न देना अवैध।

  2. हाई कोर्ट ने सरकार के भेदभावपूर्ण रवैये को खारिज किया।

  3. प्रिंसिपलों को कार्यभार तिथि से बकाया भुगतान का आदेश।

विधि संवाददाता, शिमला। हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने सरकार की उस कार्रवाई को अवैध और भेदभावपूर्ण करार दिया है, जिसके तहत प्रवक्ताओं को प्रिंसिपल (स्कूल कैडर) का कार्यभार सौंपने के बावजूद उन्हें उस पद का उच्च वेतनमान देने से इन्कार कर दिया था। न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर और न्यायाधीश रंजन शर्मा की खंडपीठ ने सुरिंदर सिंह व अन्य सहित कुल नौ याचिकाकर्ताओं का निपटारा करते हुए यह आदेश दिया।

कोर्ट ने सरकार को निर्देश दिए कि सभी याचिकाकर्ताओं को उनके द्वारा प्रिंसिपल पद का कार्यभार संभालने की वास्तविक तिथि से उच्च वेतनमान, ग्रेड-पे और एरियर (बकाया) का भुगतान 30 नवंबर 2026 तक अनिवार्य रूप से कर दिया जाए।

कोर्ट ने खारिज किया सरकार का तर्क

सरकार की ओर से दलील दी गई कि प्रवक्ताओं को केवल प्लेसमेंट आधार पर अस्थायी तौर पर जिम्मेदारी दी थी और उन्होंने स्वेच्छा से बिना अतिरिक्त वित्तीय लाभ काम करना स्वीकार किया था। कोर्ट ने सरकार के इस तर्क को खारिज कर दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब किसी कर्मचारी से उच्च पद की पूरी जिम्मेदारी और काम लिया जा रहा है, तो उसे उस पद का वेतन पाने का कानूनी अधिकार है।

सरकार भेदभावपूर्ण रवैया नहीं अपना सकती

हाई कोर्ट ने पाया कि प्रिंसिपल पद के लिए हेडमास्टर और लेक्चरर दोनों ही 50:50 के कोटे के तहत फीडर कैडर का हिस्सा हैं। जब साल 2015-18 के दौरान हेडमास्टर को प्लेसमेंट आधार पर प्रिंसिपल बनाया था तो सरकार ने उन्हें कार्यभार संभालने की पहली तारीख से ही उच्च वेतनमान और वरिष्ठता के सभी लाभ दे दिए थे। कोर्ट ने कहा, एक ही पद के लिए दो समान श्रेणियों के बीच सरकार इस तरह का भेदभावपूर्ण रवैया नहीं अपना सकती। यह समानता के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है। 

यह है मामला

याचिकाकर्ताओं के अनुसार, वे सभी प्रवक्ता प्रिंसिपल पद पर पदोन्नति के लिए पात्रता रखते थे। विभाग में पद खाली होने के बावजूद सरकार ने नियमित विभागीय पदोन्नति समिति (डीपीसी) की बैठक नहीं की। इसके बजाय सरकार ने अधिसूचना जारी कर इन प्रवक्ताओं को उनके मौजूदा कम वेतनमान पर ही प्रिंसिपल पद का कार्यभार संभालने के आदेश दे दिए और यह शर्त लगा दी कि वे उच्च वेतन के हकदार नहीं होंगे। बाद में साल 2025 में हाई कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद नियमित डीपीसी बुलाई और आठ मई 2025 को इन्हें नियमित प्रिंसिपल बनाया, लेकिन वित्तीय लाभ केवल नियमितीकरण की तारीख से दिए और पिछले कार्यकाल का लाभ सिर्फ काल्पनिक रखा। इसके खिलाफ प्रवक्ताओं ने हाई कोर्ट का रुख किया था।

यह भी पढ़ें: हिमाचल हाई कोर्ट का आदेश न मानने पर 3 स्कूल प्रिंसिपल को कारण बताओ नोटिस, निदेशालय में उपस्थित होने के निर्देश