चंडीगढ़-बद्दी और बिलासपुर रेललाइन के लिए पैसा नहीं देगी हिमाचल सरकार, केंद्र को पत्र भेज इन्कार की 4 वजह बताईं
हिमाचल प्रदेश सरकार ने चंडीगढ़-बद्दी और कीरतपुर-बिलासपुर-बैरी रेललाइन परियोजनाओं के लिए धन देने से इनकार कर दिया है।

हिमाचल सरकार ने रेलाइन के लिए बजट देने से इन्कार कर दिया है। प्रतीकात्मक फोटो
HighLights
हिमाचल सरकार ने रेल परियोजनाओं के लिए धन देने से किया इनकार।
चंडीगढ़-बद्दी, बिलासपुर-बैरी लाइनों को राष्ट्रीय परियोजना बनाने की मांग।
राज्य पर भारी कर्ज और बढ़ी लागत को बताया मुख्य कारण।
प्रकाश भारद्वाज, शिमला। हिमाचल प्रदेश सरकार चंडीगढ़-बद्दी और कीरतपुर-बिलासपुर-बैरी रेललाइन के निर्माण के लिए पैसा नहीं देगी। हिमाचल सरकार का कहना है कि कीरतपुर-बिलासपुर-बैरी रेललाइन का निर्माण राष्ट्रीय परियोजना के तहत किया जाए। चंडीगढ़-बद्दी रेललाइन का लाभ प्रदेश को कम और चंडीगढ़ को अधिक मिलेगा। इसलिए हिमाचल इस रेललाइन पर भी खर्च करने को तैयार नहीं है।
प्रदेश सरकार ने इस संबंध में केंद्र को पत्र लिखा है। ये पत्र केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जगत प्रकाश नड्डा द्वारा प्रश्न खड़ा किए जाने के बाद लिखा गया है।
करना था 2300 करोड़ खर्च
हिमाचल सरकार को दोनों रेल लाइन पर लगभग 2000 व 300 करोड़ कुल 2300 करोड़ रुपये की राशि खर्च करनी थी। सरकार का तर्क है कि सामरिक और रक्षा महत्व की दृष्टि से कीरतपुर-बिलासपुर लाइन को पूर्णत: राष्ट्रीय परियोजना घोषित कर केंद्र को इसका 100 प्रतिशत खर्च उठाना चाहिए। जबकि चंडीगढ़-बद्दी लाइन का भौतिक विस्तार और वाणिज्यिक लाभ हिमाचल से अधिक पड़ोसी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेश चंडीगढ़ को मिलेगा।
दोनों परियोजनाओं की शुरुआत के समय लागत काफी कम थी। लेकिन कठिन भौगोलिक परिस्थितियों, सुरंग निर्माण और भूमि अधिग्रहण में हुई देरी के कारण लागत में भारी उछाल आया है, जिससे राज्य की देनदारी बढ़ती गई।
राज्य सरकार के इन्कार के मुख्य आधार
राज्य सरकार ने केंद्रीय रेल मंत्रालय को भेजे आधिकारिक पत्र में मुख्य रूप से चार आधार प्रस्तुत किए हैं। प्रदेश पर वर्तमान में 1.04 लाख करोड़ से अधिक का कर्ज और पुरानी देनदारियों का बोझ है। परियोजनाओं के शुरुआती अनुबंधों के मुकाबले अब बजट कई गुना बढ़ चुका है।
राज्य सरकार का कहना है कि प्रारंभिक चरण में जिस व्यय का अनुमान लगाया गया था, अब उसका 25 प्रतिशत या 50 प्रतिशत वहन करना राज्य के वार्षिक बजट संतुलन को पूरी तरह बिगाड़ देगा।
पहाड़ी राज्यों में रेल निर्माण की प्रति किलोमीटर लागत मैदानी इलाकों की तुलना में 4 से 5 गुना अधिक है। सुरंगों, पुलों और लैंडस्लाइड सुरक्षा उपायों का खर्च अकेले एक छोटे राज्य पर डालना व्यावहारिक नहीं है।
चंडीगढ़-बद्दी रेललाइन में क्षेत्रीय असमानता
चंडीगढ़-बद्दी लाइन में अधिकांश ट्रैक का निर्माण पंजाब और हरियाणा-चंडीगढ़ क्षेत्र में हो रहा है, जिसका वित्तीय बोझ हिमाचल वहन कर रहा है। चंडीगढ़-बद्दी के लिए संशोधित अनुपात को यदि केंद्र पूरी लागत नहीं उठाता, तो 50:50 के फार्मूले को बदलकर पूर्वोत्तर एवं विशेष श्रेणी वाले पहाड़ी राज्यों की तर्ज पर 90:10 (90 प्रतिशत केंद्र और 10 प्रतिशत राज्य) किया जाए, अथवा वित्तीय हिस्सेदारी केवल हिमाचल की सीमा के भीतर आने वाले ट्रैक की लंबाई के अनुपात में तय हो।
चंडीगढ़-बद्दी लाइन में 31 किमी ट्रैक में से हिमाचल में सिर्फ 3 किमी ही है। 31.14 किमी लंबी इस लाइन का लगभग 28 किमी हिस्सा पंजाब, हरियाणा और चंडीगढ़ से होकर गुजरेगा।
राष्ट्रीय परियोजना घोषित करने के पीछे तर्क
कश्मीर रेल लिंक जैसा मॉडल बिलासपुर रेल लाइन को लेकर घोषित होना चाहिए। जिस तरह उधमपुर-श्रीनगर-बारामूला रेल लिंक और ऋषिकेश-कर्णप्रयाग लाइन को सामरिक महत्व के आधार पर राष्ट्रीय परियोजना बनाकर केंद्र ने इसका पूरा खर्च उठाया, वही नीति इस लाइन पर भी लागू होनी चाहिए। यदि इसे औपचारिक रूप से राष्ट्रीय परियोजना घोषित किया जाता है, तो हिमाचल का 25 प्रतिशत का अंशदान पूरी तरह समाप्त हो जाएगा और निर्माण कार्य बिना राज्य के फंड पर निर्भर रहे सीधे रेलवे के केंद्रीय पूंजीगत बजट से चलेगा। यह लाइन भविष्य में बनने वाली सामरिक बिलासपुर-मनाली-लेह रेललाइन का प्रवेश द्वार है। यह भारत-चीन सीमा पर तैनात सशस्त्र बलों, भारी सैन्य रसद और रक्षा उपकरणों को लद्दाख तक पहुंचाने का सबसे सुरक्षित माध्यम बनेगी।
क्या कहना है सीएम का
प्रदेश पहले से ही वित्तीय आपदा और केंद्र की ओर से मिलने वाली वित्तीय मदद की कटौती से जूझ रहा है। हम विकास के विरोधी नहीं हैं, लेकिन जिस चंडीगढ़-बद्दी लाइन का 90 प्रतिशत हिस्सा दूसरे राज्यों में है, उसका आधा खर्च हिमाचल की जनता के टैक्स से क्यों दिया जाए? इसी तरह बिलासपुर-लेह रेललाइन देश की सीमाओं की सुरक्षा के लिए बन रही है। यह सेना की आवश्यकता है। केंद्र सरकार को चाहिए कि वह बड़े दिल का परिचय दे और इसे राष्ट्रीय परियोजना घोषित कर पूरा खर्च वहन करे।
-सुखविन्द्र सिंह सुक्खू, मुख्यमंत्री, हिमाचल प्रदेश।
विकास विरोधी मानसिकता : जयराम
वर्तमान राज्य सरकार विकास विरोधी मानसिकता से काम कर रही है। केंद्र की मोदी सरकार ने हिमाचल के रेल बजट में ऐतिहासिक वृद्धि की और इन दोनों प्रोजेक्ट्स को प्राथमिकता दी। पूर्व भाजपा सरकार ने इसके लिए जमीन अधिग्रहण और वित्तीय बजट सुनिश्चित किया था। आज अपनी वित्तीय कुप्रबंधन की नाकामियों को छुपाने के लिए सरकार रेल परियोजनाओं के लिए पैसा देने से मुकर रही है। यदि बद्दी रेललाइन रुकी, तो बीबीएन से उद्योग पलायन करेंगे और राज्य के युवाओं का भविष्य अंधकारमय होगा।
-जयराम ठाकुर, नेता प्रतिपक्ष एवं पूर्व मुख्यमंत्री, हिमाचल प्रदेश।
यह भी पढ़ें: हिमाचल में लेह रेललाइन और हाईवे की अलाइनमेंट में टकराव, मनाली में 19 रेलवे क्रॉसिंग प्वाइंट बने अड़चन
