यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Dec 07, 2017 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
बिना वजह के मुकदमों से बचे सरकार: हाईकोर्ट
यह आदेश न्यायाधीश तरलोक सिंह चौहान ने दौलत राम द्वारा दायर याचिका की सुनवाई के दौरान पारित किए।

शिमला, जागरण संवाददाता। हाईकोर्ट ने प्रदेश मुख्य सचिव को आदेश दिए हैं कि वह इस बाबत सभी विभागों को जरूरी निर्देश जारी करें कि किसी भी मामले को दायर करने या उसके बचाव में पक्ष रखने से पूर्व हिमाचल प्रदेश लिटिगेशन पॉलिसी का पूर्णतया पालन कर लिया जाए। यह आदेश न्यायाधीश तरलोक सिंह चौहान ने दौलत राम द्वारा दायर याचिका की सुनवाई के दौरान पारित किए।
याचिका में दिए तथ्यों के अनुसार प्रार्थी की चार बीघा दो बिस्वा भूमि शिमला के कोटखाई में थी। राज्य सरकार गुम्मा से बखोल सड़क मार्ग के निर्माण के लिए निजी भूमि का अधिग्रहण करना चाहती थी। प्रार्थी की कुछ भूमि का अधिग्रहण कर लिया गया और 19 अगस्त 2011 को इस भूमि का अवार्ड भी पारित कर लिया।
रेवेन्यू सेटलमेंट के पश्चात यह पाया गया कि खसरा नंबर 208 में 0-06- 46 हेक्टेयर भूमि जो राज्य सरकार कब्जे में थी, वास्तव में कुछ भूमि प्रार्थी की थी और इस बाबत प्रार्थी ने राजस्व एंट्री को दुरुस्त करने के लिए सेटलमेंट कलेक्टर के समक्ष दो सितंबर 2008 को आवेदन दाखिल किया था। उसके बाद में राजस्व एंट्री को दुरुस्त किया गया। राजस्व रिकॉर्ड दुरुस्त होने के बाद 0-3-00 हेक्टेयर भूमि को प्रार्थी के नाम दर्ज कर लिया गया। जबकि 0-03-46 हेक्टेयर भूमि को राज्य सरकार के नाम दर्ज किया गया।
गलत रेवेन्यू एंट्री के कारण प्रार्थी की भूमि राज्य सरकार के नाम की दर्शाई गई थी और प्रार्थी को इस बाबत कोई भी क्षतिपूर्ति हर्जाना नहीं दिया गया। प्रदेश उच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में यह स्पष्ट किया कि समय आ गया है कि किसी भी मामले को दायर करने से पूर्व या मामले के बचाव में जवाब दाखिल करने से पूर्व हिमाचल प्रदेश लिटिगेशन पॉलिसी 2011 के सिद्धांतों का पूर्णतया पालन करें ताकि राज्य सरकार को बेवजह पडऩे वाले खर्च से बचाया जा सके और बेवजह की मुकदमेबाजी को कोर्ट में जाने से बचा जाए।