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54 साल बाद हिमाचल में नए जिले बनाने की कवायद, पूर्व सरकारों में भी उठती रही मांग; क्या बदलेगा प्रशासनिक नक्शा?

By Anil Thakur Edited By: Rajesh Sharma
Published: Thu, 15 Oct 2026 06:32 AM (IST)

हिमाचल प्रदेश में 54 साल बाद नए जिले बनाने की संभावनाओं पर मंथन शुरू हो गया है, जिसके लिए मुख्यमंत्री सुक्खू सरकार ने एक आयोग गठित किया है।

हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविन्द्र सिंह सुक्खू। जागरण आर्काइव

हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविन्द्र सिंह सुक्खू। जागरण आर्काइव

HighLights

  1. हिमाचल में 54 साल बाद नए जिले बनाने पर विचार।

  2. सुक्खू सरकार ने प्रशासनिक पुनर्गठन के लिए आयोग बनाया।

  3. नए जिलों से वित्तीय बोझ बढ़ने की चुनौती।

राज्य ब्यूरो, शिमला। हिमाचल प्रदेश में 54 साल बाद नए जिले बनाने की संभावनाओं पर फिर से मंथन शुरू हो गया है। मुख्यमंत्री सुखविन्द्र सिंह सुक्खू की सरकार ने प्रशासनिक इकाइयों के पुनर्गठन के लिए आयोग गठित किया है। हालांकि, अभी किसी नए जिले के गठन की घोषणा नहीं हुई है। जिला, उपमंडल व तहसील बनाने की मांग कोई नई नहीं है।

वीरभद्र सिंह ने नकार दी थी मांग

सबसे पहले वीरभद्र सरकार में रामपुर को जिला बनाने की मांग उठी थी। वीरभद्र सिंह ने स्पष्ट इन्कार किया था। वह संगठनात्मक जिला बनाने के भी विरोधी थे। उनका तर्क था कि आने वाले समय में संगठनात्मक जिले ही जिलों की मांग करेंगे जो प्रशासनिक खर्च को बढ़ाएंगे।

धूमल व जयराम कार्यकाल में भी उठी मांग

इसके बाद प्रेमकुमार धूमल व जयराम ठाकुर के समय में भी यह मांग उठी। नए जिले तो बने नहीं सोलन जिला के बद्दी, कांगड़ा जिला के नुरपूर व देहरा को पुलिस जिला बनाकर यहां एसपी की तैनाती की गई। 

उपमंडल, तहसील व उप तहसीलें हर सरकार में बनती रही है। सबसे ज्यादा तहसील व उप तहसील वीरभद्र सरकार के कार्यकाल में बनी थी। हाल ही में सुक्खू सरकार ने जसवां परागपुर में भी उपमंडल बनाकर यहां एसडीएम की तैनाती की है।

1972 में आखिरी बार बने थे तीन नए जिले

हिमाचल प्रदेश में आखिरी बार एक सितंबर 1972 को जिलों का पुनर्गठन हुआ था। उस समय हमीरपुर, ऊना और सोलन तीन नए जिले बनाए गए थे। इसके बाद प्रदेश में जिलों की संख्या 12 पर स्थिर है। अब पांच दशक से अधिक समय बाद जिलों की व्यवस्था की समीक्षा से अलग जिला बनाने की मांग कर रहे क्षेत्रों की उम्मीदें बढ़ी हैं।

नई इकाइयां बनाने के साथ खर्च भी बड़ी चुनौती

प्रदेश पर करीब 1.04 लाख करोड़ रुपये का कर्ज है। सरकार खर्च में कटौती और वित्तीय संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल पर जोर दे रही है। ऐसे में नए जिले बनाने के फैसले के साथ वित्तीय पहलू भी महत्वपूर्ण होगा। जिला बनने पर उपायुक्त, अतिरिक्त उपायुक्त, अतिरिक्त जिला दंडाधिकारी, पुलिस अधीक्षक और अन्य अधिकारियों की तैनाती के अलावा विभिन्न विभागों के कार्यालय, भवन, वाहन और कर्मचारियों की व्यवस्था करनी होगी। इससे सरकारी खजाने पर अतिरिक्त बोझ पड़ेगा। 

विधानसभा में सरकार ने नए जिलों के प्रस्ताव से किया था इन्कार

भाजपा विधायक डा. जनक राज ने विधानसभा के शीतकालीन सत्र में चार नए जिले बनाने की संभावनाओं और एक जिला गठित करने पर आने वाले खर्च को लेकर सवाल पूछा था। मुख्यमंत्री सुखविन्द्र सिंह सुक्खू ने उस समय सदन को बताया था कि नए जिलों के गठन का कोई प्रस्ताव सरकार के पास विचाराधीन नहीं है। अब आयोग के गठन से पूरे प्रशासनिक ढांचे की समीक्षा की औपचारिक प्रक्रिया शुरू हुई है। इसे नए जिले बनाने की मंजूरी के तौर पर नहीं देखा जा सकता।

1948 में चार जिलों से शुरू हुआ था सफर

  • 15 अप्रैल 1948 को हिमाचल प्रदेश के गठन के समय महासू, मंडी, चंबा और सिरमौर चार जिले थे। 
  • वर्ष 1960 में कांगड़ा, लाहुल-स्पीति, कुल्लू और शिमला जिले बने। 
  • वर्ष 1966 में महासू जिले का अस्तित्व समाप्त होने के बाद किन्नौर जिला बना। 
  • वर्ष 1972 में हमीरपुर, ऊना और सोलन के गठन से जिलों की संख्या 12 हो गई। वर्तमान में प्रदेश में 12 जिले, 81 उपमंडल, 92 विकास खंड तथा 193 तहसीलें और उपतहसीलें हैं। अब आयोग की रिपोर्ट बताएगी कि बदलती प्रशासनिक जरूरतों के बीच प्रदेश के नक्शे में कितना बदलाव होगा और लंबे समय से जिला बनाने की मांग कर रहे क्षेत्रों को राहत मिलने की कितनी संभावना है।

वीरभद्र सिंह ने कांगड़ा को बनाया था दूसरी राजधानी

वीरभद्र सिंह जब मुख्यमंत्री थे तो उन्होंने कांगड़ा को दूसरी राजधानी का दर्जा दिया था। कांगड़ा में शीतकालीन प्रवास व विधानसभा सत्र की शुरूआत की थी। इसका मकसद यही था कि लोगों को शिमला न आना पड़े। हालांकि दूसरी राजधानी का दर्जा केवल कागजों तक ही रहा। वर्तमान सरकार ने कांगड़ा को पर्यटन राजधानी घोषित किया है।

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