'बेटी शादी के बाद माता-पिता की जायदाद से अलग नहीं हो जाती', हिमाचल हाई कोर्ट ने ADM का आदेश किया निरस्त
हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि शादी के बाद भी बेटी अपने माता-पिता की जायदाद से अलग ...और पढ़ें

हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट का शिमला स्थित परिसर। जागरण आर्काइव
HighLights
शादी के बाद बेटी माता-पिता की जायदाद से अलग नहीं होती।
हाई कोर्ट ने एडीएम शिमला का आदेश किया रद्द।
शादीशुदा बेटी को नौतोड़ भूमि का पट्टा जारी करने का निर्देश।
विधि संवाददाता, शिमला। हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि शादी होने से कोई बेटी अपने माता-पिता के परिवार या उनकी जायदाद से अलग नहीं हो जाती। न्यायाधीश संदीप शर्मा की अदालत ने कहा कि अगर पिता को सरकार से कोई जमीन (नौतोड़) मिली थी तो पिता और मां की मौत के बाद उनकी शादीशुदा बेटी को उस जमीन का कानूनी पट्टा (कागजात) पाने का हक है।
अदालत ने टिप्पणी कर कहा कि प्रशासनिक आदेश वैधानिक नियमों से ऊपर नहीं हो सकते। पीठ ने स्पष्ट किया कि वर्ष 1980 का पत्र केवल प्रशासनिक स्पष्टीकरण था। हिमाचल प्रदेश नौतोड़ लैंड रूल्स, 1968 में ऐसा कोई नियम नहीं है जो विवाहित बेटी को कानूनी वारिस के रूप में भूमि का दावा करने से रोकता हो।
शादीशुदा बेटियों को समान अधिकार प्राप्त
अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता अपने नाम पर नए सिरे से नौतोड़ भूमि आवंटन की मांग नहीं कर रही थी, बल्कि वह 1972 में मूल आवंटी (अपने पिता) की क्लास-एक कानूनी वारिस होने के नाते पट्टा जारी करने का अनुरोध कर रही थी, जिनका उस भूमि पर निरंतर कब्जा रहा है। शादीशुदा बेटियों को समान अधिकार प्राप्त हैं।
अदालत ने एडीएम शिमला का पट्टा रद करने वाला आदेश निरस्त कर दिया। राज्य सरकार को निर्देश दिए कि दो महीने के भीतर शांति के नाम जमीन का पट्टा जारी किया जाए।
1972 में महिला के पिता को मंजूर हुई थी जमीन
यह मामला शिमला जिले की चौपाल तहसील के नवनी गांव की शांति का है। साल 1972 में शांति के पिता मीना राम को सरकार की नौतोड़ योजना (खेती के लिए भूमिहीन/गरीबों को जमीन देने की योजना) के तहत तीन बीघा दो बिस्वा जमीन मंजूर हुई थी। मीना राम को जमीन का कब्जा तो मिल गया और वे उस पर खेती भी करने लगे, लेकिन राजस्व अधिकारियों (पटवारी/तहसीलदार) की लापरवाही के चलते जमीन का सरकारी पट्टा साइन नहीं हो सका।
माता-पिता के निधन के बाद अकेली वारिस
मीना राम के निधन के बाद पत्नी ने पट्टा जारी करने की अर्जी दी। पट्टा दोबारा तैयार हुआ, पर अधिकारियों ने फिर दस्तखत नहीं किए। 2012 में मां के इंतकाल के बाद परिवार में अकेली वारिस शांति बची, जो उस जमीन पर लगातार खेती कर रही थी।
वर्ष 2023 में शांति ने प्रशासन से गुहार लगाई कि जमीन का पट्टा उनके नाम किया जाए। एसडीएम ने भी शांति के पक्ष में सिफारिश की।
2024 में रद कर दिया आवेदन
एक जनवरी 2024 को शिमला के एडीएम ने शांति का आवेदन यह कहकर रद कर दिया कि 1980 के सरकारी नियम/निर्देश के मुताबिक, शादीशुदा बेटियों को नौतोड़ जमीन का पट्टा नहीं दिया जा सकता। प्रशासन के इस फैसले के खिलाफ याचिकाकर्ता शांति ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की।
