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'भरण-पोषण और घरेलू हिंसा का केस दर्ज करना क्रूरता नहीं', पति-पत्नी विवाद में हिमाचल हाई कोर्ट ने दी अहम व्यवस्था

By Rohit Nagpal Edited By: Rajesh Sharma
Published: Tue, 29 Sep 2026 03:31 PM (IST)

हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि पत्नी द्वारा अपने अधिकारों के लिए कानूनी रास्ता अपनाना पति के ...और पढ़ें

हिमाचल हाई कोर्ट ने पति-पत्नी विवाद अहम कानूनी व्यवस्था दी है। प्रतीकात्मक फोटो

हिमाचल हाई कोर्ट ने पति-पत्नी विवाद अहम कानूनी व्यवस्था दी है। प्रतीकात्मक फोटो

HighLights

  1. पत्नी द्वारा कानूनी रास्ता अपनाना मानसिक क्रूरता नहीं मानी जाएगी।

  2. हाई कोर्ट ने पति की तलाक याचिका को खारिज कर दिया।

  3. पति द्वारा बच्चे की जन्मतिथि न जानना उदासीनता दर्शाता है।

विधि संवाददाता, शिमला। हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने पारिवारिक मामलों में एक महत्वपूर्ण कानूनी व्यवस्था देते हुए स्पष्ट किया है कि यदि कोई परेशान पत्नी अपने अधिकारों के लिए कानूनी रास्ता चुनती है, तो इसे पति के प्रति मानसिक क्रूरता नहीं माना जा सकता। अदालत ने यह भी कहा कि सामान्य परिस्थितियों में कोई भी विवाहित महिला अपने नवजात बच्चे के साथ बिना किसी गंभीर या प्रतिकूल परिस्थिति के अपना वैवाहिक घर और पति का साथ स्वेच्छा से नहीं छोड़ती है।

यह फैसला न्यायाधीश अजय मोहन गोयल और न्यायाधीश योगेश जसवाल की खंडपीठ ने पति की याचिका को खारिज करते हुए सुनाया। कोर्ट ने निचली अदालत (फैमिली कोर्ट मंडी) के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसमें पति की तलाक की अर्जी को खारिज कर दिया गया था।

2015 में हुई शादी

दंपती की शादी 19 अप्रैल 2015 को हिंदू रीति-रिवाजों से हुई थी और उनका एक बेटा है। शादी के वक्त पत्नी चंडीगढ़ में जीएनएम की ट्रेनिंग कर रही थी। पति ने याचिका में आरोप लगाया था कि पत्नी ट्रेनिंग के बाद उसके साथ रहने के बजाय अधिकांश समय अपने मायके में ही रहती थी और अक्सर झगड़ा करती थी।

उसने यह भी दावा किया कि पत्नी ने उसके खिलाफ धारा 125 सीआरपीसी  (भरण-पोषण) और घरेलू हिंसा कानून के तहत झूठे केस दर्ज कराए हैं, जो मानसिक क्रूरता के दायरे में आता है।

कोर्ट ने पत्नी के मामले को सही पाया

दूसरी ओर, पत्नी ने सभी आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि पति उसे बेरहमी से पीटता था और प्रताड़ित करता था, जिस कारण उसे अपने मायके में शरण लेने के लिए मजबूर होना पड़ा। हाई कोर्ट ने पाया कि पत्नी द्वारा घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत दायर किया गया मामला सही पाया गया था और घुमारवीं की अदालत ने उसके पक्ष में 2000 मासिक भरण-पोषण, 5,000 मुआवजा और रहने के लिए कमरा देने का आदेश सुनाया था।

अदालत ने कहा कि सक्षम न्यायालय द्वारा पत्नी को घरेलू हिंसा की शिकार मानना ही पति के उन दावों को खारिज करता है, जिसमें उसने इन मुकदमों को 'झूठा' कहा था। एक पीड़ित पत्नी द्वारा गुजारे-भत्ते और आश्रय के लिए वैधानिक कानूनी उपचारों का सहारा लेना किसी भी तरह से पति के प्रति क्रूरता नहीं है।

यह तलाक का आधार नहीं

अदालत ने 'हिंदू मैरिज एंड डिवोर्स (हिमाचल प्रदेश) रूल्स, 1982' का हवाला देते हुए कहा कि जब क्रूरता के आधार पर तलाक मांगा जाता है, तो याचिका में क्रूरता की विशिष्ट घटनाओं, तारीख, समय और स्थान का स्पष्ट उल्लेख होना अनिवार्य है। केवल यह कह देना कि "पत्नी का व्यवहार असहनीय था या वह झगड़ा करती थी", तलाक का आधार नहीं बन सकता। पति के आरोप पूरी तरह से अस्पष्ट थे।

सगे बेटे की जन्मतिथि नहीं मालूम

अदालत उस समय हैरान रह गई जब जिरह के दौरान पति ने स्वीकार किया कि उसे अपने सगे बेटे की जन्मतिथि तक मालूम नहीं है। पीठ ने कहा कि यह व्यवहार अपने ही बच्चे के प्रति घोर उदासीनता और लापरवाही को दर्शाता है, न कि वैवाहिक दायित्वों को निभाने की इच्छा को। अदालत ने यह भी पाया कि पति ने अपनी पत्नी को वापस बुलाने के लिए कभी भी पंचायत, गांव के बुजुर्गों या किसी सम्मानित व्यक्ति की मदद नहीं ली और न ही कभी अदालत में 'दाम्पत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना' के लिए कोई कानूनी केस दायर किया। 

हाई कोर्ट ने माना कि चूंकि पत्नी को पति के दुर्व्यवहार और शारीरिक हिंसा के कारण अलग रहने के लिए मजबूर होना पड़ा था, इसलिए पति इस मामले में 'परित्याग' के आधार पर भी तलाक का हकदार नहीं है। इन तमाम तथ्यों को देखते हुए हाई कोर्ट ने पति की अपील को खारिज कर दिया और मंडी फैमिली कोर्ट के फैसले की पुष्टि की।

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