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'DPC में विभाग की देरी का खामियाजा कर्मचारी क्यों भुगते', हिमाचल हाई कोर्ट ने कर्मचारी के पक्ष में सुनाया फैसला

By Rohit Nagpal Edited By: Rajesh Sharma
Published: Tue, 29 Sep 2026 03:03 PM (IST)Updated: Tue, 29 Sep 2026 03:39 PM (IST)

हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने कर्मचारियों के हित में फैसला सुनाया है कि डीपीसी में विभाग की देरी का खामियाजा ...और पढ़ें

हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट परिसर। जागरण आर्काइव

हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट परिसर। जागरण आर्काइव

HighLights

  1. विभाग की ढिलाई से डीपीसी देरी का खामियाजा कर्मचारी नहीं भुगतेंगे।

  2. योग्य कर्मचारियों को पिछली तारीख से पदोन्नति और वित्तीय लाभ मिलेंगे।

  3. समय पर पदोन्नति के लिए विचार करना कर्मचारी का मौलिक अधिकार है।

विधि संवाददाता, शिमला। हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने कर्मचारियों के हित में फैसला देते हुए कहा कि विभाग या नियोक्ता की ढिलाई के कारण अगर डीपीसी में देरी होती है, तो उसका खमियाजा कर्मचारी क्यों भुगते। कोर्ट ने आदेश दिया कि योग्य कर्मचारियों को पिछली तारीख से यानी बैकडेट से प्रमोशन और उसके सभी वित्तीय लाभ मिलने चाहिएं। न्यायाधीश जिया लाल भारद्वाज ने सुभाष चंद्र द्वारा दायर याचिका को स्वीकार करते हुए यह फैसला सुनाया।

कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 16 के तहत समय पर पदोन्नति के लिए विचार किया जाना कर्मचारी का एक संवैधानिक और मौलिक अधिकार है। यदि पद खाली था और कर्मचारी तमाम योग्यताएं पूरी करता था, तो विभाग द्वारा सालाना विभागीय पदोन्नति समिति की बैठक न बुलाना एक प्रशासनिक चूक है। इस ढिलाई का खामियाजा कोई भी कर्मचारी नहीं भुगतेगा।

हर साल के पहले क्वार्टर में डीपीसी कराना अनिवार्य

सरकार के कार्मिक विभाग के नियमों के अनुसार, हर साल के पहले क्वार्टर में खाली या संभावित पदों के लिए डीपीसी कराना अनिवार्य है, ताकि समय पर पैनल तैयार हो सके। 

लोक निर्माण विभाग इंजीनियर की याचिका

याचिकाकर्ता सुभाष चंद्र 1977 में लोक निर्माण विभाग में जूनियर इंजीनियर के पद पर नियुक्त हुए था। वर्ष 2003 में असिस्टेंट इंजीनियर का पद खाली था, जिसके लिए वह पूरी तरह योग्य और वरिष्ठ था, लेकिन विभाग ने समय पर डीपीसी प्रक्रिया पूरी नहीं की। बाद में जब वर्ष 2006 में डीपीसी हुई, तो उन्हें प्रमोशन तो दे दिया गया, लेकिन इसे 2003 की बजाय 2006 से लागू किया गया।

विभाग ने तर्क दिया था कि नियमों के तहत प्रमोशन केवल आगे की तारीख से ही दिया जा सकता है। हाई कोर्ट ने सरकार के उस आदेश को खारिज कर दिया, जिसमें बैकडेट से प्रमोशन देने से मना किया गया था। 

कोर्ट ने सरकार को आदेश दिए कि याचिकाकर्ता को वर्ष 2003 से ही असिस्टेंट इंजीनियर के पद पर प्रमोट माना जाए और सभी परिणामी लाभ दिए जाएं।

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