5000 करोड़ की सेब आर्थिकी पर संकट, हिमाचल में आधी रह गई पैदावार; 2.58 से घटकर 1.17 करोड़ पेटी उत्पादन
हिमाचल प्रदेश में सेब उत्पादन में भारी गिरावट दर्ज की गई है, जो पिछले साल के मुकाबले आधे से भी ...और पढ़ें

हिमाचल प्रदेश में सेब उत्पादन कम हो गया है। प्रतीकात्क फोटो
HighLights
हिमाचल में सेब उत्पादन पिछले साल के मुकाबले आधा रह गया।
गर्म होती सर्दी और मौसम के उतार-चढ़ाव मुख्य कारण बने।
5000 करोड़ की सेब आर्थिकी पर गंभीर संकट मंडराया।
राज्य ब्यूरो, शिमला। हिमाचल प्रदेश के बागों में इस बार फूल तो खूब खिले, लेकिन मौसम ने फल टिकने नहीं दिए। गर्म होती सर्दी ने सेब के पेड़ों की जरूरी ठंड यानी चिलिंग ऑवर्स घटाए और फूल आने के समय तापमान के उतार-चढ़ाव, वर्षा व ओलावृष्टि ने फल सेट पर चोट कर दी। नतीजा यह कि मंडियों में पहुंचने वाला सेब पिछले साल के मुकाबले आधे से भी कम रह गया।
दो अक्टूबर 2025 तक 20 किलो की 2.58 करोड़ पेटी सेब मंडियों में पहुंची थी, जो पहली अक्टूबर 2026 तक घटकर 1.17 करोड़ पेटी रह गई। यानी आवक में 54.7 प्रतिशत की गिरावट।
बदलते मौसम की चेतावनी
पांच हजार करोड़ की सेब आर्थिकी के लिए यह महज कम पैदावार नहीं, बदलते मौसम की बड़ी चेतावनी है। सेब उत्पादन में गिरावट का संबंध गर्म होती सर्दियों और जलवायु परिवर्तन से मौसम के असामान्य उतार-चढ़ाव से जोड़ा जा रहा है। सेब के पेड़ को पर्याप्त ठंड की जरूरत होती है। रात का तापमान छह डिग्री से कम रहने की अवधि को चिलिंग आवर्स कहा जाता है।
तापमान बढ़ने और सर्दी की अवधि घटने से कलियों के विकास, फूल आने और फल सेट पर असर पड़ता है। वैज्ञानिक अध्ययनों में कम चिलिंग को असामान्य फूल आने और कम फल-सेट से जोड़ा गया है। मार्च-अप्रैल 2026 में गर्म सर्दी के बाद अचानक तापमान गिरने से मध्य और ऊंचाई वाले क्षेत्रों में फूल आने के दौरान बाग प्रभावित हुए।
सेब उत्पादन के ऊंचाई की ओर खिसकने के संकेत
वैज्ञानिक अध्ययनों में हिमाचल में सेब की खेती के ऊंचाई की ओर खिसकने के संकेत मिले हैं, जबकि निचले क्षेत्रों में गर्म होती जलवायु उत्पादन और गुणवत्ता पर दबाव बढ़ा रही है। ऐसे में आने वाले वर्षों में सेब पट्टी का पारंपरिक भूगोल बदल सकता है। हालांकि मैदानी क्षेत्रों में अलग किस्मों के सेब की खेती के बेहतर परिणाम सामने आ रहे हैं, लेकिन सिंचाई, उपयुक्त किस्मों और बदलते मौसम के अनुरूप बागवानी पद्धतियों पर निवेश अब उत्पादन बनाए रखने के लिए अहम होगा।
पिंक बड से फल सेट होने तक पड़ी मौसम का वार
पिंक बड और फूल आने की नाजुक अवस्था में तापमान में उतार-चढ़ाव, वर्षा और ओलावृष्टि ने परागण और फल सेट को प्रभावित किया। कई बागों में फूल तो आए, लेकिन अपेक्षित संख्या में फल टिक नहीं सके। उच्च घनत्व और अत्याधुनिक किस्में भी इस नुकसान की पूरी भरपाई नहीं कर पा रही हैं। इसका एक बड़ा कारण सिंचाई सुविधा की कमी है। राज्य में केवल 33 प्रतिशत क्षेत्र सिंचित है, जबकि उच्च घनत्व वाले पौधों के लिए नियमित सिंचाई जरूरी है।
क्या कहते हैं अधिकारी
इस बार पिछले वर्ष की तुलना में मंडियों में करीब आधा सेब पहुंचा है। सेब उत्पादन जलवायु परिवर्तन और मौसम से काफी प्रभावित हुआ है। विभाग उच्च घनत्व के साथ अत्याधुनिक किस्मों को बढ़ावा दे रहा है।
-डा. सतीश शर्मा, निदेशक, बागवानी विभाग।
बागवानों की राय
बाग में सामान्यतः पांच हजार पेटी उत्पादन होता था, जो इस बार घटकर करीब 500 पेटी रह गया। उच्च घनत्व वाले पौधों की गुणवत्ता और सिंचाई को बड़ी चुनौती है। बागवानी को बचाने के लिए सेब के साथ अन्य फलों का उत्पादन भी बढ़ाना होगा।
-हरीश चौहान, अध्यक्ष, हिमाचल प्रदेश सब्जी एवं फल उत्पादक संघ।
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