मंडी, जागरण संवाददाता। पवन चक्की की ब्लेड के कचरे से अब पुनर्चक्रण तकनीक से ग्लास फाइबर प्राप्त करना आसान होगा। कचरा अब दबाना पड़ेगा न जलाना। इससे पर्यावरण सुरक्षित होगा। डंपिंग की समस्या से निजात मिलेगी। ग्लास फाइबर के दाम भी नियंत्रित रहेंगे। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आइआइटी) मंडी के शोधार्थियों ने माइक्रोवेव व पर्यावरण मित्र रसायनों की मदद से ब्लेड से पालिमर समग्र को पुनर्चक्रण (रीसाइकल) करने की तकनीक विकसित की है।

पवन चक्की (विंड टरबाइन ब्लेड) की चक्रीय अर्थव्यवस्था (सर्कुलर इकानमी ) को बढ़ावा मिलेगा

नई तकनीक से पुनर्चक्रण प्रौद्योगिकी में बड़े बदलाव आने से देश में पवन चक्की (विंड टरबाइन ब्लेड) की चक्रीय अर्थव्यवस्था (सर्कुलर इकानमी ) को बढ़ावा मिलेगा वर्तमान में प्रचलित डंपिंग व थर्मल आधारित पुनर्चक्रण प्रक्रिया की तुलना में यह तकनीक अधिक तेज, टिकाऊ और पर्यावरण को स्वच्छ रखने में सहायक होगी। शोध के निष्कर्ष नींदरलैंड के रिसोर्सेज़ कंजर्वेशन एंड रीसाइक्लिंग’ जर्नल में प्रकाशित हुए हैं। शोध आइआइटी मंडी के स्कूल आफ मैकेनिकल एंड मेटेरियल्स इंजीनियरिंग के सहायक प्रोफेसर डा. सनी जफर और स्कूल आफ केमिकल साइंसेज के एसोसियट प्रोफेसर डा. वेंकट कृष्णन के मार्गदर्शन में हुआ है। इसमें सुश्री मंजीत रानी व सुश्री प्रियंका का योगदान रहा है।

अक्षय ऊर्जा अपनाने की ओर बढ़ रही दुनिया

दुनिया भर में पवन बिजली जैसी अक्षय ऊर्जा अपनाई जा रही है ताकि जीवाश्म ईंधन आधारित ऊर्जा से होने वाले नुकसान कम हो। पवन बिजली संयंत्र लगाने के मामले में देश चौथे स्थान पर है। 31 जुलाई 2022 तक देश की कुल स्थापित पवन बिजली क्षमता 40.893 गीगावाट थी। पवन बिजली के दृष्टिकोण से देश के अहम क्षेत्रों में विंड टरबाइन (पवन चक्की) लगाए जाते हैं। टरबाइन के ब्लेड पालिमर समग्र से बने होते हैं। पालिमर सिस्टम को मजबूत बनाने के लिए कार्बन फाइबर और ग्लास फाइबर का प्रयोग होता है।

हाइड्रोजन पेरोक्साइड और एसिटिक एसिड का प्रयोग

शोध प्रमुख डा. सनी जफर बताते हैं कि बेकार हो चुके ग्लास फाइबर रीनफोर्स्ड पालिमर (जीएफआरपी) समग्र का पुनर्चक्रण करने के लिए माइक्रोवेव की मदद से टिकाऊ रसायनिक पुनर्चक्रण (एमएसीआर) प्रक्रिया विकसित की है। इसके लिए हाइड्रोजन पेरोक्साइड और एसिटिक एसिड के साथ जीएफआरपी समग्र के रसायनिक अपघटन का माइक्रोवेव का उपयोग किया गया। हाइड्रोजन पेरोक्साइड और एसिटिक एसिड दोनों पर्यावरण मित्र रसायन हैं। एक का उपयोग व्यापक स्तर पर कीटाणुनाशक व एंटीबायोटिक के रूप में होता है। सिरका काे एसिटिक एसिड कहते हैं।

उपयोग समाप्त होने पर निष्क्रिय कर दिया जाता है ढांचा

पवन चक्की ब्लेड का उपयोग पूरी तरह समाप्त होने के बाद पूरे ढांचे को निष्क्रिय कर दिया जाता है। इसके कोटिंग पालिमर में ग्लास फाइबर होते हैं। आम तौर पर उसे डंपिंग साइट में डाल या फिर जला दिया जाता है। कचरा निपटाने के यह दोनों तरीके पर्यावरण में प्रदूषण बढ़ाते हैं। 2024 से 2034 के बीच पूरी दुनिया में पक्की चक्की ब्लेड से लगभग 200,000 टन समग्र कचरा उत्पन्न होने का अनुमान है। इससे पवन बिजली से पर्यावरण को होने वाले लाभ में कमी आएगी। डंपिंग साइट में कचरा फेंकने संबंधी प्रतिबंध और कच्चे माल की लागत में उतार-चढ़ाव के चलते पालिमर समग्र की लागत भी बढ़ेगी।

पर्यावरण के लिए सबसे अच्छी तकनीक

डा.वेंकट कृष्णन कहना है कि इस तकनीक से पुनर्चक्रण प्रौद्योगिकी में बड़े बदलाव आएंगे। इससे देश में पवन चक्की ब्लेड की चक्रीय अर्थव्यवस्था को तेजी से आगे बढ़ने में मदद मिलेगी। ग्लास फाइबर पुनर्चक्रण में हानिकारक रसायन उपयोग नहीं होगा। पुनर्चक्रण से प्राप्त ग्लास फाइबर में 99 प्रतिशत से अधिक मजबूती पाई गई है। पवन चक्की की ब्लेड के कचरे से अब ग्लास फाइबर निकालना होगा आसान होगा।

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Edited By: Richa Rana

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