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14 साल की उम्र से रोजाना 30 KM दौड़कर सावन बरवाल ने बनाया स्टैमिना, एशियाई खेलों में 44 वर्ष बाद जीता मेडल

By Digital Desk Edited By: Rajesh Sharma
Published: Sun, 27 Sep 2026 12:36 PM (IST)Updated: Sun, 27 Sep 2026 12:47 PM (IST)

एशियन गेम्स में पुरुष मैराथन स्पर्धा में रजत पदक जीतने वाले सावन बरवाल ने अपनी कड़ी मेहनत और कोच गोपाल ठाकुर के मार्गदर्शन से यह उपलब्धि हासिल की है।

एथलीट सावन बरवाल व मंडी के जोगेंद्रनगर में उनका परिवार।

एथलीट सावन बरवाल व मंडी के जोगेंद्रनगर में उनका परिवार।

HighLights

  1. सावन बरवाल ने एशियाई खेलों में मैराथन का रजत पदक जीता।

  2. 14 वर्ष की आयु से 30 किमी प्रतिदिन दौड़ने का अभ्यास।

  3. कोच गोपाल ठाकुर के मार्गदर्शन से मिली यह बड़ी सफलता।

कैलाश चंद, जोगेंद्रनगर (मंडी)। एशियन गेम्स में पुरुष मैराथन स्पर्धा में रजत पदक जीतने वाले सावन बरवाल की मेहनत के पीछे उनकी लग्न, दृढ निश्चय व उनके गुरु गोपाल ठाकुर का मार्गदर्शन है। आज 42 किलोमीटर दौड़ने वाले सावन बरवाल 14-15 वर्ष की आयु में ही 30 से 32 किलोमीटर की रोज दौड़ लगाते थे। कोच गोपाल ठाकुर के सानिध्य में उन्होंने प्रशिक्षण लिया और आज नाम रोशन किया है।

2012 में शुरू किया संघर्ष

सावन बरवाल का एथलेक्टिकस का सफर वर्ष 2012 में उस समय आरंभ हुआ जब वह अपने कोच गोपाल ठाकुर के पास आए। सावन के पिता कुलदीप बरवाल उन्हें उनके पास छोड़ गए। पांच साल वह जोगेंद्रनगर में रहे और कालेज की पढ़ाई भी पूरी की।

सुबह 5 बजे उठकर मैदान में

कोच गोपाल ठाकुर बताते हैं कि सावन शांत स्वभाव का था। सुबह पांच बजे उठकर मैदान में प्रैक्टिस करना, फिर स्कूल जाना और शाम को फिर प्रैक्टिस करना उसकी दिनचर्या थी। वह प्रतिदिन 30 किलोमीटर तक की जोगेंद्रनगर से घटासनी, जोगेंद्रनगर से घट्टा, जोगेंद्रनगर से मकरीड़ी तक दौड़ लगाता था।

2019 में सेना में चयन

सावन ने वर्ष 2012 से 2018 के बीच विभिन्न राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में आठ पदक हासिल किए। वर्ष 2019 में भारतीय सेना में शामिल होने के बाद उसे बेहतर प्रशिक्षण और प्रतिस्पर्धा का मंच मिला।

एक गुरु के लिए सबसे बड़ा सम्मान होता है कि उसका शिष्य देश के लिए पदक जीते। सुबह जब उसने रजत पदक जीता तो दिल खुशी से झूम उठा। 11 बजे उसे फोन पर बधाई दी। उसे जब प्रशिक्षित करता था तो लगता था, यह कुछ करेगा। अगला लक्ष्य अब ओलंपिक है।
-गोपाल ठाकुर, एथलेटिक्स कोच, जोगेंद्रनगर।

सुबह तीन बजे उठकर देखी बेटे की दौड़

सुबह बेटे सावन की दौड़ है, तो यह सोचकर रात को नींद कम आई, तीन बजे ही मैं उठ गया और अपनी पत्नी सुभद्रा देवी व बड़ी बहू को जगा दिया। चार बजे हमने मोबाइल फोन पर ही आनलाइन प्रतियोगिता देखी। बेटे के रजत पदक जीतने की खुशी में सुबह ही आस पड़ोस के लोगों के साथ खुशी साझा की। मैं तो एक चालक था, लेकिन आज बेटे ने नाम रोशन कर दिया। अब ओलिंपिक में पदक जीतने का सपना है।

एशियन गेम्स में मैराथन में जोगेंद्रनगर के रडा निवासी सावन के पिता कुलदीप बरवाल, माता सुभद्रा बरवाल, पत्नी शबनम की खुशी देखते ही बनती थी। घर पर बधाइयों का सिलसिला दिनभर जारी रहा। माता सुभद्रा देवी बताती हैं कि बेटे ने कहा है कि वह 20 या 22 अक्टूबर का घर आएगा। उस दिन उसके पसंदीदा मटर पनीर और अन्य पकवान ही बनेंगे। घर आने पर अपनी कुल देवी माता गढ़वाली मंदिर में जाकर पूजा-अर्चना करेंगे। 

पत्नी ने मायके में देखी प्रतियोगिता

सावन बरवाल के ससुराल बनांदर में भी जश्न का माहौल रहा। उनका विवाह इसी वर्ष मई में हुआ है। उनकी पत्नी शबनम सावन माह के चलते अपने मायके में है। शबनम ने बताया कि शादी के पांच महीने बाद ही बड़ी खुशी हमारे परिवार को मिली है। मैंने सुबह चार बजे उठकर उनकी प्रतियोगिता देखी, सब बधाइयों दे रहे हैं।

 

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