मंडी में तीन साल के संकट के बाद धूमधाम से मनेगा सायर पर्व, अखरोट की बंपर पैदावार से दामों में भारी गिरावट
मंडी में तीन साल की प्राकृतिक आपदा के बाद इस बार सायर पर्व उत्साह से मनाया जा रहा है। अखरोट ...और पढ़ें
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अखरोट की बंपर पैदावार से दामों में आई गिरावट।
HighLights
मंडी में तीन साल बाद उत्साह से मनाया जा रहा सायर पर्व
अखरोट की बंपर पैदावार से दामों में आई भारी गिरावट
'द्रूवा देना' परंपरा से रिश्तों में मिठास, खुशियों का माहौल
साक्षी ठाकुर, मंडी। जब कुदरत का कहर थम जाता है, तो परंपराएं और अधिक जीवंत हो उठती हैं। बीते तीन वर्षों से प्राकृतिक आपदाओं और भीषण मानसून का दंश झेल रहे छोटी काशी मंडी के लोगों के लिए इस बार का सायर पर्व खुशियों की नई सौगात लेकर आया है।
17 सितंबर को मनाया जाने वाला यह लोक पर्व केवल मौसम के बदलने का प्रतीक नहीं है, बल्कि संकटों से उबरकर जीवन में लौटी उम्मीदों का उत्सव है। वर्षा ऋतु के शांतिपूर्ण समापन, फसल की सुरक्षा और पशुधन की समृद्धि का यह त्योहार इस बार पूरे उल्लास के साथ मनाने की तैयारियां जोर-शोर से चल रही हैं।
मंडी के ऐतिहासिक सेरी मंच पर सजे अखरोट के बाजार इस बदले हुए माहौल की गवाही दे रहे हैं। 2023 और 2025 में भारी बारिश से हुई तबाही के कारण जहां त्योहारों का रंग फीका पड़ गया था, वहीं इस वर्ष कुदरत की मेहरबानी से अखरोट की बंपर पैदावार हुई है।
अखरोट के घटे दाम, खरीदारी के लिए उमड़ी भीड़
उत्पादन अधिक होने से इस बार अखरोट के दामों में काफी गिरावट आई है, जिससे हर वर्ग का चेहरा खिल उठा है। बीते वर्ष जो अखरोट 800 रुपये प्रति सौ के हिसाब से बिक रहा था, इस बार वह कागजी अखरोट 600 रुपये प्रति सौ की दर पर उपलब्ध है।
इसके अलावा भुर्ज और बादामी अखरोट 400 से 500 रुपये प्रति सौ के भाव से बिक रहे हैं। नगर निगम द्वारा दी गई जगह पर बालीचौकी और आसपास के इलाकों से आए व्यापारियों की दुकानें सज गई हैं।
द्रूवा देना: परंपरा में बसा अपनापन
सायर केवल एक पर्व नहीं, बल्कि रिश्तों को जोड़ने वाली डोर है। इस दिन घर-घर में स्वादिष्ट व्यंजन बनते हैं। पूजा के समय धान, मक्की, पेठा, गलगल, तिल और कोठा के साथ अखरोट अर्पित किए जाते हैं।
इसके बाद शुरू होती है मंडयाली संस्कृति की अनूठी और भावनात्मक परंपरा द्रूवा देना—जहां छोटे बच्चे और युवा हाथ में दूर्वा और अखरोट लेकर बड़े-बुजुर्गों के चरण स्पर्श कर उनका आशीर्वाद लेते हैं।
नवविवाहित भी एक माह बाद मायके से ससुराल लौटती हैं। मंदिरों के कपाट भी खुल जाते हैं। तीन वर्षों की निराशा के बाद, इस बार सेरी मंच पर अखरोट की नई खेप और लोगों की भारी भीड़ यह बता रही है कि आपदाएं चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हों, मंडी की अटूट सांस्कृतिक आस्था के आगे हमेशा हार जाती हैं।
