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वसीयत का बदला जाना गैरकानूनी नहीं, मंडी कोर्ट ने खारिज की अपील; कहा- अपरिवर्तनीय शब्द लिख देना अंतिम नहीं

By Hansraj Saini Edited By: Rajesh Sharma
Published: Wed, 09 Sep 2026 06:51 AM (IST)

मंडी जिला न्यायालय ने महेंद्र सिंह बनाम गुलाब सिंह मामले में निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखते हुए याचिकाकर्ता की अपील खारिज कर दी।

मंडी कोर्ट ने वसीयत में बदलाव को लेकर अहम निर्णय दिया। प्रतीकात्मक फोटो

मंडी कोर्ट ने वसीयत में बदलाव को लेकर अहम निर्णय दिया। प्रतीकात्मक फोटो

HighLights

  1. मंडी कोर्ट ने वसीयत बदलने को कानूनी ठहराया।

  2. 'अपरिवर्तनीय' शब्द वसीयत को अंतिम नहीं बनाता।

  3. व्यक्ति जीवनकाल में नई वसीयत बनाने को स्वतंत्र।

जागरण संवाददाता, मंडी। हिमाचल प्रदेश में जिला न्यायालय मंडी ने महेंद्र सिंह बनाम गुलाब सिंह मामले में ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए याचिकाकर्ता की अपील खारिज कर दी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि कोई भी व्यक्ति अपने जीवनकाल में पहली वसीयत को रद कर दूसरी वसीयत या सेटलमेंट डीड (समझौता पत्र) निष्पादित करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है।

मामले के अनुसार अपीलकर्ता महेंद्र सिंह ने दावा किया था कि चार अप्रैल 2007 को उसने गुलाब सिंह से 50,000 रुपये में जमीन का सौदा किया था। स्टांप ड्यूटी से बचने के लिए उसी दिन गुलाब सिंह ने उसके पक्ष में एक अपरिवर्तनीय वसीयत और इकरारनामा निष्पादित किया था तथा जमीन का कब्जा भी उसे सौंप दिया था।

हालांकि, बाद में वर्ष 2012 में गुलाब सिंह ने अपने बेटे सुरेंद्र पाल के नाम सेटलमेंट डीड निष्पादित कर दी, जिसे महेंद्र सिंह ने अदालत में चुनौती दी थी।

अपरिवर्तनीय शब्द लिख देना अंतिम नहीं

न्यायाधीश ने माना कि केवल वसीयत में अपरिवर्तनीय शब्द लिख देने से वह अंतिम नहीं हो जाती। व्यक्ति जब तक जीवित है, वह अपनी संपत्ति के हस्तांतरण के लिए नई वसीयत बना सकता है। इसके अलावा, केवल सेल एग्रीमेंट (इकरारनामा) से किसी को संपत्ति का मालिकाना हक नहीं मिलता। इन तथ्यों के आधार पर अदालत ने अपील खारिज कर दी।

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