अब 10 नहीं, सिर्फ 5.5 घंटे में पहुंचेंगे चंडीगढ़ से मनाली, फोरलेन परियोजना से बदली हिमाचल की तस्वीर
कीरतपुर मनाली फोरलेन परियोजना ने यात्रा को सुरक्षित और सुखद बनाया है, जिससे मनाली से चंडीगढ़ का सफर 10 घंटे से घटकर मात्र साढ़े पांच घंटे रह गया है।

कीरतपुर-मनाली फोरलेन पर NATM तकनीक से तैयार हुईं 19 सुरंगें।
HighLights
मनाली से चंडीगढ़ का सफर अब साढ़े पांच घंटे का
एनएटीएम तकनीक से 30 किमी लंबी 19 सुरंगों का निर्माण
परियोजना ने हिमाचल के पर्यटन और व्यापार को गति दी
हंसराज सैनी, मंडी। हिमालय की दुर्गम और संवेदनशील चोटियों के बीच सफर करना अब जोखिम भरा नहीं, बल्कि एक सुरक्षित और सुखद अनुभव बन गया है। कीरतपुर मनाली फोरलेन परियोजना ने प्रदेश में कनेक्टिविटी की पूरी तस्वीर बदल दी है।
इस बदलाव का सबसे बड़ा नायक बना है सुरंग निर्माण का न्यू आस्ट्रियन टनलिंग मेथड (एनएटीएम)। इस आधुनिक तकनीक के दम पर मनाली से चंडीगढ़ के बीच 10 घंटे का थकाऊ सफर अब घटकर महज साढ़े पांच घंटे का रह गया है।
पहाड़ की प्राकृतिक ताकत बनी सुरंग की ढाल
हिमालय की युवा और कमजोर पर्वत श्रृंखलाओं में भूगर्भीय दबाव और चट्टानें खिसकना बेहद आम चुनौती है। एनएटीएम तकनीक की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह पहाड़ से मुकाबला करने के बजाय उसकी अपनी प्राकृतिक मजबूती का इस्तेमाल करती है।
खुदाई के दौरान चट्टानों की संरचना का लगातार वैज्ञानिक विश्लेषण किया जाता है और उसी जरूरत के हिसाब से तुरंत सपोर्ट सिस्टम तैयार किया जाता है। इससे सुरंग के भीतर अनपेक्षित दबाव से निपटना आसान हो जाता है।
टीबीएम के कड़वे सबक से विशेषज्ञों ने चुना लचीला रास्ता
पर्वतीय क्षेत्रों में भारी-भरकम टनल बोरिंग मशीन (टीबीएम) का इस्तेमाल हर बार सफल नहीं रहा। पार्वती प्रोजेक्ट-द्वितीय के दौरान करीब 150 करोड़ रुपये की टीबीएम मशीन पहाड़ के सीने में ऐसी फंसी कि उसे आज तक बाहर नहीं निकाला जा सका।
इस अनुभव से सीख लेते हुए सुरंग विशेषज्ञ हिमांशु कपूर और टीम ने एनएटीएम तकनीक पर भरोसा जताया, जो बदलती भूगर्भीय परिस्थितियों के हिसाब से खुद को ढाल लेती है।
खतरनाक मोड़ों और भूस्खलन जोन से स्थायी मुक्ति
इस महत्वाकांक्षी परियोजना ने यात्रियों को उन रास्तों से राहत दिलाई है, जो सालों से डर का दूसरा नाम थे। स्वारघाट की खतरनाक चढ़ाई-उतराई और हणोगी का कुख्यात भूस्खलन जोन अब बीते दिनों की बात बन चुका है।
कीरतपुर से नाचगला तक 6,800 मीटर लंबी छह सुरंगें बनी हैं, जिनमें स्वारघाट-कैंचीमोड़ की 3,600 मीटर लंबी जुड़वां सुरंग शामिल है। मंडी बाईपास (मलोरी) की चार सुरंगों ने मंडी शहर को भारी ट्रैफिक से निजात दिलाई है, जबकि दयोड़ से औट तक 10 सुरंगों से वाहनों की आवाजाही हो रही है।
विकास का मजबूत ढांचा और आर्थिक गति
परियोजना के तहत 30 किलोमीटर लंबी 19 सुरंगों के निर्माण में करीब 2.50 लाख टन सीमेंट और 2.00 लाख टन स्टील का इस्तेमाल हुआ है। पंडोह बाईपास, चार मील और नौ मील सहित 12 अन्य सुरंगें भी योजना का हिस्सा हैं।
इन सुरंगों ने केवल दूरी ही नहीं घटाई, बल्कि हिमाचल के पर्यटन, बागवानी और स्थानीय व्यापार को एक नई गति दी है। एनएटीएम तकनीक ने यह साबित कर दिया है कि हिमालय में कोई भी निर्माण प्रकृति से टकराकर नहीं, बल्कि उसके साथ बेहतर तालमेल बिठाकर ही सफल हो सकता है।
