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हिमाचल के नवजातों पर बड़ा अध्ययन, क्यों अधिक ऊंचाई पर जन्म लेने वाले शिशुओं के चेहरे की अलग होती है बनावट?

Published: Sun, 04 Oct 2026 08:24 AM (IST)

हिमाचल में हुए एक अध्ययन से पता चला है कि अधिक ऊंचाई पर जन्मे नवजातों के चेहरे की लंबाई और ...और पढ़ें

10 साल की रिसर्च में चौंकाने वाला खुलासा।

10 साल की रिसर्च में चौंकाने वाला खुलासा।


HighLights

  1. हिमाचल में नवजातों पर 10 साल का बड़ा अध्ययन हुआ

  2. अधिक ऊंचाई पर जन्मे शिशुओं के चेहरे की बनावट भिन्न पाई गई

  3. यह अंतर भ्रूण के विकास के दौरान ही शुरू होने की संभावना

संवाद सहयोगी, सुंदरनगर। हिमालय की ऊंचाई और वहां अपेक्षाकृत कम आक्सीजन की उपलब्धता का असर बच्चे के जन्म से पहले ही उसके शारीरिक विकास पर पड़ने लगता है। श्री लाल बहादुर शास्त्री नेरचौक मेडिकल कालेज के शरीर रचना विभाग के डा. पंकज सोनी के अध्ययन में इस दिशा में महत्वपूर्ण संकेत सामने आए हैं।

हिमाचल के अलग-अलग ऊंचाई वाले क्षेत्रों में जन्मे 409 पूर्णकालिक नवजात शिशुओं पर किए गए अध्ययन में ऊंचाई के साथ चेहरे की लंबाई और नाक की ऊंचाई में महत्वपूर्ण अंतर पाया गया है।

10 साल तक चला शोध

अध्ययन में बाह्य हिमालय और आंतरिक हिमालय के विभिन्न ऊंचाई वाले क्षेत्रों से संबंधित नवजातों को शामिल किया गया। इसमें प्रदेश भर के क्षेत्रीहय अस्पतालों में नवजातों की जांच की गई।

करीब दस साल तक चले इस शोध कार्य में जन्म के 12 से 24 घंटे के भीतर शिशुओं की लंबाई, सिर की परिधि, चेहरे की लंबाई व चौड़ाई तथा नाक की ऊंचाई और चौड़ाई सहित विभिन्न शारीरिक माप लिए गए।

शोध में सामने आया कि अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों में जन्मे नवजातों के चेहरे की लंबाई और नाक की ऊंचाई कम ऊंचाई वाले क्षेत्रों में जन्मे बच्चों से अलग रही। इन दोनों मापों में अंतर सांख्यिकीय रूप से महत्वपूर्ण पाया गया।

चूंकि माप जन्म के कुछ ही घंटों के भीतर लिए गए, इसलिए शोधकर्ताओं ने संभावना जताई है कि इन अंतर की शुरुआत भ्रूण के विकास के दौरान ही हो सकती है।

कम आक्सीजन और भ्रूण विकास के संबंध पर शोध

डा.पकंज सोनी ने बताया कि अधिक ऊंचाई वाले हिमालयी क्षेत्रों में वातावरण में आक्सीजन की उपलब्धता अपेक्षाकृत कम होती है। अध्ययन में इसी परिस्थिति और भ्रूण के चेहरे के विकास के बीच संभावित संबंध पर चर्चा की गई है।

हालांकि शोध में जीन या कोशिकीय स्तर पर प्रत्यक्ष जांच नहीं हुई है, इसलिए किसी विशेष जैविक प्रक्रिया को अभी अंतिम निष्कर्ष नहीं माना जा सकता।

आईजीएमसी शिमला में प्रस्तुत किया शोध

डा. पंकज सोनी ने अपने शोध की प्रस्तुति आईजीएमसी शिमला में भी की। डॉ. पंकज सोनी के अनुसार, भविष्य में उच्च हिमालयी क्षेत्रों के अधिक नवजातों को अध्ययन में शामिल कर इन निष्कर्षों की व्यापक स्तर पर जांच की जा सकती है।

साथ ही आणविक और आनुवंशिक तकनीकों के माध्यम से यह समझने का प्रयास किया जा सकता है कि ऊंचाई और कम आक्सीजन की परिस्थितियां भ्रूण के विकास को किस प्रकार प्रभावित करती हैं।

यह अध्ययन मानव विकास, भ्रूण विज्ञान, नवजात चिकित्सा और उच्च पर्वतीय चिकित्सा के क्षेत्र में आगे के शोध के लिए आधार प्रदान कर सकता है।

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