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नाश्ते में कुट्टु के आटे का पराठा, लंच में गुच्छी; राष्ट्रपति ने कुल्लू के खास पारंपरिक व्यंजनों का लिया स्वाद

By jaswant ThakurEdited By: Rajesh Sharma
Published: Wed, 07 Oct 2026 03:26 PM (GMT+05:30)Updated: Wed, 07 Oct 2026 03:57 PM (GMT+05:30)

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने मनाली दौरे के दौरान कुल्लू के पारंपरिक व्यंजनों का स्वाद लिया, जिसमें गुच्छी की सब्जी, लाल चावल और कुट्टु के आटे का पराठा प्रमुख थे।

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने मनाली में कुल्लू के पारंपरिक व्यंजन कुट्टु के पराठे और गुच्छी का स्वाद लिया।

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने मनाली में कुल्लू के पारंपरिक व्यंजन कुट्टु के पराठे और गुच्छी का स्वाद लिया।

HighLights

  1. राष्ट्रपति मुर्मू ने मनाली में कुल्लू के पारंपरिक व्यंजनों का स्वाद लिया।

  2. उनके भोजन में गुच्छी, लाल चावल और कुट्टु पराठा प्रमुख थे।

  3. प्रशासन ने विलुप्त होते रासायनिक खाद मुक्त अनाजों को परोसा।

जसवंत ठाकुर, मनाली। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु मनाली दौरे पर हैं। राष्ट्रपति के लिए प्रशासन की ओर से कुल्लू के पारंपरिक व्यंजनों की व्यवस्था की गई है। मंगलवार को रात्रि भोजन में राष्ट्रपति ने गुच्छी की सब्जी, लाल चावल व राजमाह का स्वाद लिया। बुधवार सुबह राष्ट्रपति ने कुट्टु के आटे का परांठा व काउनी, ओघला, बेसा का सूप पीया।

प्रशासन की ओर से राष्ट्रपति के खानपान की विशेष व्यवस्था की गई है। खाने में अधिकतर विलुप्त होते पारंपरिक अनाज शामिल किए गए हैं। दोपहर के भोजन में बाथू की खीर, कच्चा पपीता व खुमानी का मीठा, तोरी व भिंडी की सब्जी, गुच्छी व रागी का सूप, कद्दू आंबले की सब्जी, लाल चावल मुख्य रूप से शामिल रहे।

कुल्लू के स्थानीय अनाज

कुल्लू का लोकल अनाज जिसे आमतौर पर 'कुटु' या कुट्टू कहा जाता है, इसे अंग्रेजी में बकव्हीट और हिमाचली स्थानीय बोलियों में ओगला, ब्रेश, टाऊ या फाफड़ जैसे नामों से भी जाना जाता है। यह कुल्लू और हिमाचल प्रदेश के ऊंचे पहाड़ी क्षेत्रों का एक प्रमुख पारंपरिक खाद्य पदार्थ है। बड़ी बात यह है कि इन अनाज में रासायनिक खाद का इस्तेमाल नहीं किया जाता है। इन्हें नेचुरल खाद का इस्तेमाल कर उगाया जाता है। 

वैज्ञानिक रूप से कुट्टू कोई सच्चा अनाज नहीं है, बल्कि यह एक पौधे के तिकोने आकार के फल का बीज होता है। इसलिए इसे 'स्यूडोसीरियल' कहा जाता है।

सर्दियों में खा लिया तो ठंड गायब

इसकी तासीर गर्म होती है, जो पहाड़ों की ठंड में शरीर को गर्म रखने में मदद करती है। कुल्लू में स्थानीय लोग पारंपरिक रूप से सर्दियों में इसकी रोटियां (चिल्ला/कच्चेरी) बनाकर खाते हैं। मैदानी इलाकों में इसका उपयोग ज्यादातर नवरात्रि या व्रत के दौरान कुट्टू के आटे के रूप में पूरियां और पकौड़े बनाने के लिए किया जाता है।

प्रोटीन, फाइबर और आयरन जैसे पोषक तत्व

यह पूरी तरह से ग्लूटेन-मुक्त होता है। इसमें भारी मात्रा में प्रोटीन, फाइबर, मैग्नीशियम और आयरन जैसे पोषक तत्व पाए जाते हैं, जो ब्लड प्रेशर और डायबिटीज को नियंत्रित रखने में सहायक हैं।

गुच्छी की सब्जी

गुच्छी हिमाचल प्रदेश के पहाड़ी क्षेत्रों में प्राकृतिक तौर पर उगती है। यह बेहद पौष्टिक आहार है। इसकी बाजार में कीमत 25 हजार रुपये किलो तक भी होती है। 

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