कुल्लू, मुकेश मेहरा।  आम इंसान की तरह भगवान श्री रघुनाथ भी दिनचर्या की प्रक्रिया को पूरा करते हैं। सुबह उठकर दातुन करने सहित अन्य क्रियाओं को अंजाम दिया जाता है। इसके बाद स्नान व भोग के बाद भगवान अपने स्थान पर विराजमान होते हैं। अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा में लगे अस्थायी शिविर में भी रोज रघुनाथ जी की इस दिनचर्या को पुजारी पूरा करवा रहे हैं। ये प्रक्रियाएं मंत्रों के साथ की जाती हैं। इसके लिए अलग-अलग मंत्र हैं।

1651 में भगवान रघुनाथ जी की मूर्ति को अयोध्या से लाया गया था। इसे लाने वाले दमोदार जी इसके साथ भगवान की पूजा पद्धति सहित इनकी पूरी क्रियाओं की जानकारी लाए थे। इसके बाद कुल्लू में भी भगवान रघुनाथ जी की दिनचर्या जारी रखी गई है। सुबह पहले प्रहर में रघुनाथ जी के उठने के बाद उनका बिस्तर आदि सहेजा जाता है। उसके बाद तुंग नामक पेड़ की लकड़ी से भगवान की दातुन की जाती है और बाहरी क्रियाओं के बाद हाथ धोने के लिए माता तुलसी की मिट्टी का प्रयोग किया जाता है। यह प्रक्रिया शिविर में मौजूद सभी देवताओं के साथ अपनाई जाती है। इसके बाद रघुनाथ जी के स्नान की प्रक्रिया पूरा कर पहले प्रहर की पूजा होती है और उसके बाद भगवान अपने स्थान पर विराजते हैं। 

इसके बाद मध्याह्न की पूजा होती है। इसमें भी भगवान को स्नान आदि करवाकर बड़ा शृंगार किया जाता है।इसमें माता-सीता, हनुमान आदि के भी वस्त्र आदि बदले जाते हैं और उसके बाद इनका शृंगार कर छड़ीबरदार पूजा करते हैं और भोग के बाद भगवान को उनके स्थान पर बिठाया जाता है। इसी तरह शाम और रात को भी पूजा की जाती है। मध्याह्न के समय होने वाली पूजा सबसे बड़ी मानी जाती है। इसमें लगभग डेढ़ घंटे का वक्त लगता है।

यह प्रक्रिया रघुनाथ जी के स्थायी शिविर में पहुंचने पर भी होती है। पुजारियों के मुताबकि रघुनाथ जी भी आम इंसान की तरह सुबह उठकर सारी प्रक्रिया पूरी करते हैं और अयोध्या से चली आ रही इस रीत को आज भी कायम रखा गया है। छड़ीबरदार महेश्वर सिंह ने कहा कि जिस तरह इंसान अपनी दिनचर्या करते हैं, उसी तरह भगवान की भी दातुन करवाई जाती है और हाथ धुलवाए जाते हैं। इसके लिए मंत्र होते हैं। 

राज परिवार भी रहता अस्थायी शिविर में रघुनाथ जी के साथ राज परिवार के सदस्य भी अस्थायी शिविर में रहते हैं। इसमें छड़ीबरदार मुख्य रूप से मौजूद रहते हैं तथा परिवार का एक अन्य सदस्य इसमें शामिल होता है। इसके लिए अलग से स्थान बनाया जाता है। इनका रहना व खाने का प्रबंध भी यहीं होता है।

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Posted By: Babita kashyap

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