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कुल्लवी नाटी: अकेले नहीं एक लय में थिरकता है पूरा समाज, गांव से विश्व पटल तक कैसे बनाई हिमाचल के नृत्य ने पहचान?

By Digital Desk Edited By: Rajesh Sharma
Published: Sun, 20 Sep 2026 02:10 PM (IST)Updated: Sun, 20 Sep 2026 03:09 PM (IST)

कुल्लवी नाटी हिमाचल की सामूहिक जीवनशैली और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है, जो ढोल-नगाड़ों की थाप पर पूरा समाज एक ...और पढ़ें

कुल्लवी नाटी: सामूहिक नृत्य करते लोग।

कुल्लवी नाटी: सामूहिक नृत्य करते लोग।

HighLights

  1. कुल्लवी नाटी हिमाचल की सामूहिक जीवनशैली और सांस्कृतिक विरासत है।

  2. 2014 में लिम्का, 2015 में गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया।

  3. पारंपरिक पहनावा बदला, पर नाटी की आत्मा वही है।

दविंद्र ठाकुर, कुल्लू। ढोल की थाप, नगाड़े की गूंज और एक-दूसरे का हाथ थामकर एक साथ उठते कदम। पहाड़ की ढलानों और देवभूमि के गांवों में जब नाटी की लय गूंजती है तो पूरा माहौल उत्सव में बदल जाता है। कुल्लवी नाटी महज लोकनृत्य नहीं, बल्कि हिमाचल की सामूहिक जीवनशैली और सांस्कृतिक विरासत का जीवंत स्वरूप है। यह परंपरा पीढ़ी-दर-पीढ़ी मौखिक रूप से आगे बढ़ती रही है।

एक लय में थिरकता है पूरा समाज

कुल्लवी नाटी की सबसे बड़ी खूबसूरती इसकी सामूहिकता है। नर्तक कतार या घेरे में खड़े होकर हाथों में हाथ जोड़ते हैं और धीमी, लयबद्ध गति से कदम आगे-पीछे तथा दाएं-बाएं बढ़ाते हैं। ढोल, नगाड़ा, करनाल, नरसिंगा और शहनाई इसकी लय को और जीवंत बनाते हैं। विवाह, मेले, देव उत्सव, फसल कटाई और धार्मिक आयोजनों में नाटी आज भी लोगों को एक साथ जोड़ती है। कुल्लू दशहरा की सांस्कृतिक पहचान में भी इसका विशेष स्थान है।

Kullavi Nati 1

2014 में लिम्का, 2015 में गिनीज रिकॉर्ड

कुल्लवी नाटी की गूंज गांवों से निकलकर विश्व पटल तक पहुंची। सात अक्टूबर 2014 को कुल्लू दशहरा के दौरान 8,540 लोगों ने पारंपरिक वेशभूषा में नाटी प्रस्तुत कर लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड में नाम दर्ज करवाया। इसके बाद 26 अक्टूबर 2015 को ढालपुर मैदान में 9,892 प्रतिभागियों ने एक साथ नाटी प्रस्तुत कर सबसे बड़े नाटी नृत्य का गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया। इस आयोजन ने कुल्लवी नाटी को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने में अहम भूमिका निभाई।

Kullavi Nati 2

ऊन से आधुनिक परिधानों तक बदला पहनावा

पारंपरिक नाटी में पुरुष चोला, सुथान, गाची, लोई और कुल्लवी टोपी पहनते रहे हैं, जबकि महिलाएं कुर्ते-सुथान के ऊपर पाट्टू और सिर पर धाटू या थिपू सजाती हैं। चांदी के पारंपरिक आभूषण भी पहनावे का हिस्सा रहे हैं। ठंडी जलवायु के कारण पुराने समय में ऊनी कपड़ों का अधिक इस्तेमाल होता था। अब रोजमर्रा के पहनावे में आधुनिक और हल्के कपड़ों ने जगह बनाई है, लेकिन सांस्कृतिक आयोजनों में पाट्टू, धाटू, कुल्लवी टोपी, चोला और पारंपरिक आभूषण आज भी नाटी की पहचान बने हुए हैं।

परंपरा वही, अंदाज नया

समय बदला, पहनावा बदला और नाटी के मंच भी बदले, लेकिन इसकी आत्मा आज भी वही है। गांव के देव उत्सव से लेकर विश्व रिकॉर्ड तक पहुंची कुल्लवी नाटी यह बताती है कि पहाड़ की संस्कृति की असली ताकत उसकी सामूहिकता में है। यहां हर कदम अकेला नहीं, बल्कि पूरी परंपरा के साथ उठता है।

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