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न रामलीला और न ही रावण दहन…, कुल्लू दशहरा की अनूठी परंपरा; एक दिन बाद होता है देव समागम का आगाज

By Digital Desk Edited By: Rajesh Sharma
Published: Tue, 20 Oct 2026 05:51 PM (IST)Updated: Tue, 20 Oct 2026 06:03 PM (IST)

कुल्लू दशहरा देशभर के अन्य दशहरा उत्सवों से अलग है, जहां न रामलीला होती है और न रावण दहन। यह ...और पढ़ें

कुल्लू दशहरा में बुधवार से देव समागम शुरू होगा। जागरण आर्काइव

कुल्लू दशहरा में बुधवार से देव समागम शुरू होगा। जागरण आर्काइव

HighLights

  1. कुल्लू दशहरे में नहीं होती रामलीला, न रावण दहन।

  2. 300 से अधिक देवी-देवता देव मिलन परंपरा में शामिल।

  3. भगवान रघुनाथ की मूर्ति 1649 में अयोध्या से लाई गई।

जागरण टीम, कुल्लू। देशभर में जहां विजयदशमी पर रावण दहन के साथ दशहरा उत्सव का समापन होता है, वहीं देवभूमि कुल्लू में एक दिन बाद सात दिवसीय अंतरराष्ट्रीय दशहरा उत्सव का आगाज होता है। यहां न तो श्रीरामलीला का मंचन होता है और न ही रावण का पुतला जलाया जाता है। 

कुल्लू की पहचान है देव मिलन की सदियों पुरानी परंपरा, जिसमें 300 से अधिक देवी-देवता भगवान रघुनाथ जी के दरबार में हाजिरी भरने पहुंचते हैं। यही अनूठी परंपरा कुल्लू दशहरे को देश के अन्य दशहरा उत्सवों से अलग पहचान दिलाती है। 

अंतिम दिन रावण नहीं जलाई जाती हैं झाड़ियां

उत्सव के सातवें दिन ब्यास नदी के किनारे लंका बेकर में विशेष धार्मिक परंपराओं का निर्वहन किया जाता है। यहां अष्टांग बलि की औपचारिकता के बाद घास-फूस और झाड़ियों के तीन अलाव जलाए जाते हैं। इसके साथ भगवान रघुनाथ जी रथ पर सवार होकर मंदिर लौटते हैं और देवी-देवता भी अपने-अपने देवालयों की ओर प्रस्थान करते हैं। 

kullu Dussehra History

अयोध्या से कुल्लू पहुंची रघुनाथ जी की मूर्ति

मान्यता और ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, राजा जगत सिंह के शासनकाल में वर्ष 1649 में भगवान रघुनाथ जी की त्रेतायुगीन मूर्ति अयोध्या से कुल्लू लाई गई थी। तीन वर्ष तक अलग-अलग स्थानों पर रखे जाने के बाद वर्ष 1660 में मूर्ति को सुल्तानपुर में स्थापित किया गया। इसी के बाद कुल्लू में दशहरा उत्सव की परंपरा ने आकार लिया, जो आज अंतरराष्ट्रीय पहचान हासिल कर चुका है। देश में जहां दशहरा विदाई का पर्व है, वहीं कुल्लू में यह देव आस्था के सबसे बड़े समागम का शुभारंभ है।

347 देवी-देवताओं को न्योता

अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा केवल उत्सव नहीं, बल्कि देव आस्था, सदियों पुरानी परंपराओं और अनूठी मान्यताओं का महाकुंभ है। यहां कोई देवता चार दिन पैदल यात्रा कर पहुंचता है तो कोई ब्यास नदी पार नहीं करता। कहीं देवताओं के बीच धूर का विवाद है तो कहीं ऐसे देवता भी हैं, जो राजाओं के प्रयासों के बावजूद दशहरे में शामिल नहीं हुए। इस बार उत्सव में 347 देवी-देवताओं को निमंत्रण भेजा गया है। 

Kullu Dussehra Manyta

200 किमी सफर कर पहुंचते हैं देव रथ

निरमंड से आठ देवी-देवता करीब 200 किलोमीटर की दूरी तय कर दशहरा उत्सव में पहुंचते हैं। इनमें देउगी ऊर्टू चंभू, रंदल चंभू, कशोली चंभू, सप्तऋषि थंथल, मार्कंडेय ऋषि नोर, कुई कांडा नाग घाटु, शरशाई नाग शरशाह और माता भुवनेश्वरी दुराह शामिल हैं। ये देवता चार दिन पहले यात्रा शुरू करते हैं। बागासराहन, बंजार-मंगलौर क्षेत्र और औट-पनारसा के बीच पड़ाव डालने के बाद ढालपुर पहुंचते हैं। एक देवता के साथ 20 से 30 देवलू चलते हैं। यात्रा का खर्च देवता के कोष से होता है।

पांच देवताओं की अपनी अलग परंपरा

आंगु डोभी में आज भी पांच देवता दशहरा मनाते हैं, लेकिन ब्यास नदी पार कर ढालपुर नहीं आते। इनमें आजीमल नारायण सोयल, सरवल नाग सौर, शुकली नाग तांदला, जीव नारायण जाणा और जमदग्नि ऋषि मलाणा शामिल हैं। वहीं, लगघाटी के कई देवता भी दशहरे से दूरी बनाए रखते हैं। मान्यता है कि तत्कालीन राजा भी कतरूसी नारायण को दशहरा परंपरा में शामिल नहीं करवा सके थे।

64 साल बाद तीन देवताओं की वापसी

बंदरोल क्षेत्र के कुंबर दान नाग, माता फुंगणी और बाबा वीरनाथ इस बार 64 साल बाद दशहरा उत्सव में शामिल होंगे। उधर, बंजार के श्रृंगा ऋषि और बालूनाग के बीच रथ की दाईं ओर चलने को लेकर धूर विवाद है। विवाद के कारण दोनों देवताओं को रथयात्रा में शामिल होने की अनुमति नहीं मिलती। प्रशासन उन्हें अस्थायी शिविरों में रखता है। यह विवाद वर्षों से देव परंपराओं और प्रशासन के लिए चुनौती बना हुआ है।

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