लद्दाख के ड्रैगन डांस से लेकर शांगरी राजा के दरबार तक... विलुप्ति की कगार पर कुल्लू दशहरे की अनूठी लोक परंपराएं
अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा, जो अब भव्य आयोजनों के लिए प्रसिद्ध है, कभी अपनी समृद्ध लोककलाओं और पारंपरिक स्वांगों के लिए जाना जाता था।

विलुप्ति के कगार पर कुल्लू दशहरे की लोक परंपराएं।
HighLights
अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा कभी लोककलाओं, पारंपरिक स्वांगों के लिए प्रसिद्ध था
हौरण स्वांग, चंद्रावली नृत्य जैसी परंपराएं अब लुप्त हो रही हैं
कुल्लू की सांस्कृतिक पहचान बचाने हेतु इन परंपराओं का संरक्षण आवश्यक
दविंद्र ठाकुर, कुल्लू। अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा आज देश-विदेश के कलाकारों की प्रस्तुतियों और भव्य आयोजनों के लिए प्रसिद्ध है, लेकिन कभी इस उत्सव की पहचान यहां की समृद्ध लोककलाएं और पारंपरिक स्वांग हुआ करते थे।
दशहरे की रातों में प्रत्येक टैंट के पास हौरण स्वांग होता था। इसके बाद चंद्रावली और बाठड़ा नृत्य मेले की रौनक बढ़ाते थे। समय के साथ इन लोक परंपराओं का आकर्षण घटा है और कई प्रस्तुतियां अब केवल परंपरा निभाने तक सीमित रह गई हैं।
हालांकि, इनका अस्तित्व आज भी लोक संस्कृति की जीवंत विरासत के रूप में कायम है। हौरण स्वांग में दो कलाकार हिरण की प्रतीकात्मक वेशभूषा धारण कर नृत्य करते हैं। पहले वे देवी-देवताओं के शिविरों के आसपास और मेले के मध्य अपनी प्रस्तुति देते थे। इसे भगवान राम के स्वर्ण मृग प्रसंग से जोड़कर भी देखा जाता है। हालांकि, इसके उद्भव को लेकर एक दूसरा मत भी है।
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इसके अनुसार, हौरण की वेशभूषा और नृत्य शैली लद्दाख के ड्रैगन नृत्य से मिलती-जुलती है। पुराने समय में लद्दाख और यारकंद से व्यापारी कुल्लू आते थे। ऐसे में उनकी सांस्कृतिक परंपराओं का यहां पहुंचना भी संभव माना जाता है। कुछ पुरानी वृत्तचित्र फिल्मों में लद्दाखी कलाकारों के कुल्लू में ड्रैगन नृत्य करने के दृश्य भी बताए जाते हैं।
दो राजाओं के दरबार से जुड़ा था दशहरा
कभी कुल्लू दशहरे में भगवान रघुनाथ के अस्थायी शिविर के अलावा कुल्लू राजपरिवार और शांगरी रियासत के राजा का दरबार भी सजता था। वर्ष 1964 में शांगरी राजा रघुवीर सिंह के निधन के बाद दूसरा राजदरबार इस उत्सव से हमेशा के लिए विलुप्त हो गया।

वर्तमान कलाकेंद्र वाले स्थान पर कभी वृज शैली की प्रस्तुति होती थी। वृंदावन के पद्मनाभ चौबे के निर्देशन में रासमंडली दशहरे पर शास्त्रीय शैली में प्रस्तुतियां देती थी। आज इसी स्थान पर देश-विदेश के कलाकार अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं।
कभी पांच दिन का होता था दशहरा उत्सव
पुराने कांगड़ा राज्य के 1897 और 1917 के गजट के अनुसार, कुल्लू दशहरा पहले पांच दिन का होता था। समय के साथ इसकी अवधि और धार्मिक मान्यताओं में बदलाव आया। कभी सिराजी नाटी, बाठड़ा और चंद्रावली नृत्य इस उत्सव के प्रमुख आकर्षण थे।
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आज जरूरत है कि इन परंपराओं को केवल औपचारिकता तक सीमित न रखकर नई पीढ़ी से जोड़ा जाए, ताकि कुल्लू की सांस्कृतिक पहचान आने वाले समय में भी जीवित रहे।
दशहरा उत्सव में हर टेंट के पास पहले हौरण स्वांग होता था। कुल्लू की सांस्कृतिक पहचान आने वाले समय में भी जीवित रहे इसके लिए पुराने इतिहास को देख जिंदा करना चाहिए। -डॉ. सुरत राम ठाकुर साहित्यकार।
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