शिमला, जेएनएन। दीवाली के मौके पर विदेशी दिए या सामान लोगों को ना खरीदना पड़े, इसलिए कामनापूर्ण गौशाला टुटू ने गोबर के दिए बनाना शुरू किया है। त्योहारी सीजन में ये काम शुरू हुआ है. इसलिए पहले साल 10 हजार दिए ही बनाने का लक्ष्य रखा है। निजी क्षेत्र में लंबे समय तक सेवाएं देने के बाद लौटे रंजन शर्मा ने इस काम को संभाला है. उनका कहना है कि इसके लिए सांचे से लेकर अन्य पूरा सामान उपलब्ध है। गौशाला के सदस्य ही समय निकाल कर इस काम को कर रहे हैं।

 

दीवाली से पहले लक्ष्य को हासिल कर लेंगे। गौशाला के संचालक आरके पराशर और सुरेंद्र ठाकुर सहित अन्य पदाधिकारियों का दावा है कि गोबर के दिए पहले साल सभी स्थानीय मंदिरों को निशुल्क दिए जाने हैं। इसके अलावा जो दिए बचेंगे, उन्हें गौशाला में बेचने के लिए रखा जाएगा। इसे 51 या 101 रुपये की पैकिंग कर बेचे जाने हैं।

दीवाली के मौके पर इस बार प्रोजेक्ट कुछ देरी से शुरू हुआ, इसलिए सीमित संख्या में ही दिए बनाए जा रहे हैं। अगले साल दीवाली के लिए व्यवसायिक तौर पर इस काम को किया जाएगा। पूरा साल बनाने के बाद इसे सप्लाई कर गौशाल के विकास का काम करने की तैयारी है. इससे दो काम एक साथ होगे। गौशाला के आय के साधन बन सकेंगे, वहीं बाजार से विदेशी सामान को बाहर करने के लिए ग्राहकों को नया विकल्प दिया जा सकेगा।

पंजाब से ली दिए बनाने की पूरी जानकारी

पंजाब से दिए बनाने के लिए मशीन की जानकारी हासिल की। नेट पर इसमें क्या क्या डाला जाता है। इसकी जानकारी हासिल की। इसके बाद स्थानीय स्तर पर ही मशीन खरीदी। अब दिए का उत्पादन शुरू कर दिया है।

गोबर, मुल्तानी, चिकनी मिट्टी व चावल का आटा डाल रहे 

अभी दिए बनाने के लिए गोबर के साथ मुल्तानी मिट्टी, चिकनी मिट्टी, चावल का आटा इस्तेमाल किया जा रहा है. दिए सुगंधित बने, इसके लिए विभिन्न तरह की सुगंध का इस्तेमाल भी कर रहे हैं। इस बार खुद सफलता मिलती है तो आने वाले समय में आस पास की अन्य गौशालाओं के लिए प्रशिक्षण शिविर का आयोजन करने की भी योजना है।

स्थानीय महिलाओं से सहयोग मिला तो बढ़ाएंगे लक्ष्य

गौशाला संचालकों का दावा है कि स्थानीय महिलाओं का सहयोग मिलता है तो इसी दीवाली पर इस प्रोजेक्ट को बढ़े स्तर पर करने का हर संभव प्रयास किया जाएगा। आठ से दस महिलाओं से इस मसले पर बात चल रही है। यदि वे सहयोग देने को तैयार होती हैं तो इस दीवाली ही काफी ज्यादा संख्या में दिए बनाए जा सकते हैं।

धार्मिक तौर पर ज्यादा शुद्घ माने जाते हैं मिट्टी व गोबर के दीए

दीवाली पर सालों पहले मिट्टी के दिए ही जलाए जाते थे, लेकिन पिछले दशकों में मिट्टी के दिए का स्थान प्लास्टिक या आकर्षक विदेशों दीयों ने इनका स्थान ले लिया था। अब विदेशी सामान को छोड़कर लोग फिर से देशी सामान की ओर आ रहे हैं। इसी तैयारी में स्थानीय उत्पाद तैयार कर बाजार में उतारने की पूरी तैयारी चल रही है।

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