सुरेश कौशल, योल

दीपावली पर इस बार लोगों के घरों में विदेशी रंगों से नहीं बल्कि अरारोट व लकड़ी के बुरादे से रंगोली सजेगी। पिछले साल कोरोना महामारी के कारण दीपों का त्योहार फीका रहा है। इस बार बंदिशों में ढील के कारण करवाचौथ के बाद दीपावली के लिए भी लोग खरीदारी के लिए दुकानों का रुख करने लगे हैं। बाजारों में रंगोली के लिए स्वदेशी रंग भी उपलब्ध हैं। अरारोट का रंग चावल के आटे में मिक्सकर बनाया जाता है, जबकि लकड़ी के बुरादे में विभिन्न रंग मिलाए जाते हैं। बड़ी बात यह है कि इन रंगों में कोई भी केमिकल नहीं होता है। रंगोली को सुंदर बनाने के लिए महिलाएं पहले पहाड़ों से निकलने वाली विशेष मिट्टी का इस्तेमाल करती थीं लेकिन अब यह दुकानों में आसानी से उपलब्ध हो जाती है।

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दुकान में अरारोट से बने रंगों को बेच रहा हूं। अरारोट में चावल का आटा डालकर रंग बनाया जाता है। इसमें किसी भी केमिकल का प्रयोग नहीं होता है।

-शशि पंडित

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लकड़ी के बुरादे में देसी रंग डाले जाते हैं। इन रंगों की रंगोली आसानी से धुल जाती है और हाथ पर विपरीत असर नहीं पड़ता है।

- सुरेंद्र नाथ

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रंगोली बनाने के लिए विदेशी नहीं बल्कि देसी रंगों का इस्तेमाल करूंगी। साथ ही पहाड़ी से निकलने वाली विशेष मिट्टी का भी प्रयोग करूंगी।

-दीक्षा देवी

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पहले महिलाएं रंगोली बनाने के लिए प्राकृतिक रंगों का उपयोग करती थीं। अब आधुनिकता ने सभी समीकरण बिगाड़ दिए हैं।

-कांता देवी

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रंगोली बनाने के लिए सभी देसी रंगों का प्रयोग करें। साथ ही पटाखों का प्रयोग भी कम से कम करें।

-निर्मला देवी।

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विदेशी रंगों का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। बाजारों में देसी रंग उपलब्ध हैं और इनमें किसी भी केमिकल का प्रयोग नहीं होता है।

-रीता देवी

Edited By: Jagran