मंडी, हंसराज सैनी। Pandit Sukhram Family Politics, हिमाचल प्रदेश से लेकर दिल्ली की राजनीति तक किसी समय पंडित सुखराम परिवार की तूती बोलती थी। शिखर पर पहुंचने के बाद यह परिवार कुछ सालों में ही हाशिये पर आ गया। अच्छे दिनों में लिए गए गलत निर्णयों से आज यह परिवार दोराहे पर खड़ा है। राजनीतिक क्षेत्र में आज आगे कुआं तो पीछे खाई वाली स्थिति है। भाजपा से दाल नहीं गल रही, कांग्रेस भी गले नहीं लगा रही है। यह परिवार अपने राजनीतिक जीवन के सबसे खराब दौर से गुजर रहा है। किस दल में रहना है किसमें नहीं। इसको लेकर भी यह परिवार अनिर्णायक स्थिति से गुजर रहा है।

1984 तक सुखराम परिवार ने प्रदेश में अपनी शर्तों पर राजनीति की। नाम इतना ऊंचा था कि इस परिवार के बिना मंडी की राजनीति में पत्ता तक नहीं हिलता था। अपनी कार्यकुशलता से सुखराम ने मंडी जिला ही नहीं प्रदेश के लोगों के दिलों में जगह बनाई थी। प्रदेश से दिल्ली की राजनीति में पहुंच कर जिस तेजी से सुखराम शिखर पर पहुंचे उसी गति से धरातल पर आ गए। 1993 के विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री पद के प्रबल दावेदारे थे। मंडी जिला के लोगों ने कांग्रेस को 10 से नौ सीटें दी थी। नाचन हलके में कांग्रेस के बागी टेकचंद डोगरा विजयी हुए है।

23 विधायकों का समर्थन होने के बाद भी मुख्यमंत्री की कुर्सी तक नहीं पहुंच पाए थे। वीरभद्र मंत्रिमंडल में बेटे अनिल शर्मा को मंत्री बनवाने में सफल रहे थे। तीन साल बाद 1996 में घर में पड़ी सीबीआइ की रेड में करोड़ों की नकदी मिलने से सुखराम परिवार की राजनीतिक डगर कांटों भरी हो गई। कांग्रेस से निष्कासन का दंश झेलना पड़ा।

1998 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले हिमाचल विकास कांग्रेस पार्टी का गठन कर चुनाव लड़ा। मंडी की जनता ने झोली में मात्र चार सीटें डाली। किसी भी दल को बहुमत नहीं मिला था। यह चार सीटें सुखराम परिवार के लिए संजीवनी बन गई। भाजपा के साथ गठबंधन कर सरकार ने मलाईदार पद झटके लिए। कई सालों बाद लोक निर्माण विभाग फिर सुखराम के पास आया तो लोगों में उम्मीद जगी कि पंडित जी दोबारा अपने पुराने दिनों में लौट आएंगे, लेकिन जल्द ही किस्मत गच्चा दे गई। दिल्ली की एक अदालत ने दोषी करार दिया तो मंत्री पद हाथ से  निकल गया। इसके बाद  अपने ही दल के सहयोगी महेंद्र सिंह ठाकुर के साथ ठन गई।

प्रदेश की सत्ता में पूछ कम हो गई। 2003 के विधानसभा चुनाव में लोगों ने पूरी तरह ठुकराया तो 2004 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस का हाथ थाम लिया। प्रतिभा सिंह के लिए जगह जगह जाकर प्रचार किया। 2014 के लोकसभा चुनाव में इस परिवार के राजनीतिक जीवन में छोटे छोटे बदलाव आते रहे, लेकिन धीरे धीरे खुद को दोबारा कांग्रेस में स्थापित कर लिया। 2014 के लोकसभा चुनाव में प्रतिभा सिंह के चुनाव हारने से वीरभद्र सिंह व सुखराम परिवार फिर आमने सामने आ गया। प्रतिभा की हार का ठीकरा वीरभद्र सिंह ने सुखराम परिवार के सिर फोड़ दिया।

2017 के विधानसभा चुनाव आते आते अनदेखी, पार्टी व सरकार में घुटन महसूस करने के आरोप लगा भाजपा का दामन थाम लिया। यह दाव निशाने पर बैठा, लेकिन दो साल बाद 2019 के लोकसभा चुनाव में टिकट को लेकर ऐसी जंग छिड़ी। पोता आश्रय शर्मा कांग्रेस में चला गया। बेटा अनिल शर्मा भाजपा में रह गया। अनिल शर्मा को मंत्री पद की कुर्सी से हाथ धोना पड़ा। उसके बाद जो हुआ वह जगजाहिर है।

अनिर्णय की स्थिति इसलिए बनी हुई है पूरा परिवार अगर भाजपा में जाता है तो अब वह मान सम्मान नहीं मिलेगा। कांग्रेस में वरिष्ठ नेता कौल सिंह की बेटी चंपा ठाकुर रोड़ा बनकर खड़ी है। दूसरा 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा का साथ देकर कांग्रेस को सत्ता से बाहर करने की बात को कांग्रेसी नहीं भूले हैं।

Edited By: Rajesh Kumar Sharma