धर्मशाला, नवनीत शर्मा। बेशक शुरुआत देश के सबसे बड़े लोकतांत्रिक मंदिर यानी लोकसभा ने की थी ... लेकिन हिमाचल प्रदेश में माननीयों और अफसरों की महंगी गाडिय़ों के शोर, यात्रा भत्ता बढ़ाए जाने पर उपजे बवाल के बाद अब एक ताजा हवा का झोंका आया है। हिमाचल प्रदेश विधानसभा में मिलने वाला खाना अब रियायती नहीं होगा। साफ है कि शाकाहारी भोजन की थाली अब महज चालीस रुपये और मांसाहारी भोजन की थाली अब पचास रुपये में नहीं मिलेगी।

आनंदित करने वाला पक्ष यह है कि पक्ष और प्रतिपक्ष इस पर सहमत थे। लोकसभा की कैंटीन में मिलने वाला अनुदानित भोज चर्चा का विषय बना हुआ था। लोकसभा में 17 करोड़ रुपये खर्च होते थे जबकि हिमाचल प्रदेश विधानसभा में साल के औसतन 36 लाख रुपये खर्च आता है। शांता कुमार का कहना समीचीन है, 'जनप्रतिनिधियों की सब जरूरतें पूरी हों लेकिन ऐसा भी न हो कि वह आम जनता से अलग हैं।' जो हो, इस सार्थक संदेश के लिए दोनों पक्ष सराहना के पात्र हैं।

धर्मशाला के तपोवन में आयोजित शीतकालीन सत्र का यह पहला हासिल है। दूसरा हासिल है शिक्षा मंत्री सुरेश भारद्वाज का यह कहना कि अब कोई भी अध्यापक छात्राओं के साथ छेड़छाड़ का आरोपित हुआ तो उसे निलंबित नहीं, बर्खास्त किया जाएगा। यह बात तीसरे दिन हुई जब विपक्ष सदन में था। पहले दो दिन तो वॉकआउट का धारावाहिक प्रसारित हो रहा था। विपक्ष कभी प्याज की मालाएं पहन कर सदन में आ रहा था। कभी उसे महंगाई पर बात नहीं करनी थी, सिर्फ वॉकआउट के लिए जमीन बनानी थीं। शीतकालीन सत्र अक्सर गर्म रहते हैं लेकिन वे मुद्दों पर गर्म हों तो बात बने। प्याज की नाटकीय प्रस्तुति के बाद मुख्यमंत्री सामान्य से अधिक तल्ख थे... उन्होंने यहां तक कहा कि विपक्ष को न शर्म है और समझ। दोपहर के भोजन के दौरान एक चित्र ऐसा दिखा जिसमें मुख्यमंत्री और नेता प्रतिपक्ष प्रफुल्लित होकर एक-दूसरे का बाजू थामे विधानसभा अध्यक्ष के साथ खिलखिलाकर हंस रहे हैं।

आम आदमी और माननीयों में यही फर्क होता है कि जिन अनिल शर्मा ने पार्टी के लिए प्रचार नहीं किया, 'धर्म संकट' में फंसे रहे, उन्हीं के बारे में चर्चा है कि वह दोबारा अपनी सीट पर बैठेंगे। आम आदमी तो ऐसा नहीं होता। ऐसा होना क्या पूरी तल्लीनता के साथ विचारधारा को सींचने वाले कार्यकर्ता के पसीने के साथ छल नहीं होगा? खैर, इस पर कभी फिर।

दरअसल, सियासी प्याज छीलने के बाद निकलने वाले आंसुओं को पहचानना कठिन होता है कि ये खुशी के हैं दुख के। जब हंसी और मुस्कान बराबर हैं तो सदन में संवाद के प्रति उदारहृदयता क्यों नहीं है? क्या पक्ष और प्रतिपक्ष ने यह चर्चा की कि प्रदेश में बेसहारा पशुओं से निजात कैसे पाई जाए? क्या यह चर्चा कभी होगी कि अगर चंबल का घी अमेरिका में दो हजार रुपये प्रति किलोग्राम बिक सकता है तो हिमाचल में यह काम क्यों कठिन है? क्या यह चर्चा हुई कि प्रदेश पर पचास हजार करोड़ रुपये से भी ऊपर के कर्ज को कम करने का तरीका क्या है? बेरोजगारों की लंबी पंक्तियां कैसे छोटी की जा सकती हैं?

पर्यटन का अर्थ केवल कंकरीट के महलों से नहीं, विजन से, सुविधाओं से जुड़ता है? वह कौन सी सुविधा है कि महंगी गाडिय़ां ही नीति नियंताओं के लिए उचित हैं? क्या मितव्ययता का संदर्भ गाड़ी की माइलेज से नहीं जुड़ता? जिनकी जेबों से कर जा रहा है, उनके लिए आम बात नहीं, केवल वॉकआउट करेंगे? कौन कह रहा है कि पाकिस्तानी प्रधानमंत्री की तरह प्रधानमंत्री आवास की भैंसें बेच कर खर्च बचाया जाए? लेकिन जहां बचाया जा सकता है, वहां तो बचाएं। यह क्यों संभव नहीं है कि बंटा हुआ विपक्ष सत्तापक्ष के साथ मिल कर प्रदेश को कर्जमुक्ति की राह दिखाए। अनुभव तो सबके पास है, उसका लाभ 'नाटक की पटकथा' के बजाय, प्रदेश में अंतिम पंक्ति के व्यक्ति तक पहुंचाया जाए।

फिजूलखर्ची से बचना भी पैसे कमाना है। सरवत जमाल ने यूं ही नहीं कहा है : हमने खुद को बचाया है ऐसे, जैसे पैसे बचाए जाते हैं

बहरहाल, इन्वेस्टर्स मीट पर सरकार 27 दिसंबर तक पूरा पता लगाने की कोशिश करेगी कि क्या पाया है। उसके बाद तो प्रदेश भी जानना चाहेगा कि मिला क्या। लेकिन तब तक धैर्य रखने में परेशानी क्या है। साथ ही नए विधायकों को भी प्रशिक्षित करना दोनों पक्षों का दायित्व है। अभी कोई किसी को कुछ नहीं सिखा रहा। यह अच्छी बात नहीं।

सत्र ठीक है, प्रवास भी हो....

शीतकालीन सत्र में सरकार जब आती है तो विधानसभा में उसे चौकस रहना पड़ता है। शीतकालीन सत्र तो निपट जाता है, प्रवास की परंपरा गायब होने लगी है। गांव, कस्बे और हलके में जाकर सरकार के आने और अर्जियां देने की गर्माहट है, वह प्रवास से ही संभव है। आज नूरपुर, कल बैजनाथ, परसों जवाली....अब यह कम होने लगा है। सत्र तो जैसा शिमला में, वैसा ही धर्मशाला में। इस पर सरकार को विचार करना चाहिए कि सरकार अगर जनता के द्वार पहुुंचेगी तो इस बात की तसदीक भी हो जाएगी कि प्रशासन वाकई जनता के द्वार जा रहा है अथवा नहीं। लगे हाथ इस बात की पड़ताल भी हो जाए कि कांगड़ा यानी धर्मशाला में बनाए मंत्रियों के कक्षों में अन्य जिलों के छोडि़ए, कांगड़ा के ही कितने मंत्री बैठते हैं।

Posted By: Rajesh Sharma

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