नवनीत शर्मा। भारत और पाकिस्तान के बीच लगभग ढलते तनाव के बाद अब देश के साथ हिमाचल प्रदेश भी चुनावी रंग में आने लगा है। हिमपात और बारिश का सिलसिला लंबा खिंचने के कारण बेशक मौसम में बहुत बदलाव नहीं, लेकिन चिरपरिचित चुनावी मौसम आ चुका है। पहले दौर में पन्ना प्रमुख सम्मेलनों के बहाने भाजपा के बड़े नेता हिमाचल को नाप ही चुके हैं। उधर, वीरभद्र की सुक्खू के प्रति वीरता और सुक्खू के वीरभद्र के प्रति दुख के इजहार के बाद इधर कांग्रेस कुलदीप से रोशन होने की कोशिश कर रही है। नितिन गडकरी ने जिस चंबी मैदान में भाजपा में जोश भरा था, वहीं आज यानी सात मार्च को राहुल की जनसभा है। इससे पूर्व विधानसभा चुनाव में इसी मैदान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी आए थे। काफी बड़ा यह मैदान सुविधासंपन्न स्टेडियम तो नहीं बना, अलबत्ता राजनीति और राजनीतिक आयोजनों को यह खूब रास आता है।

बहरहाल, यही वह मौसम होता है जब कुछ जोड़ी जुड़े हुए हाथ नजर आते हैं ... हर आदमी से बगलगीर होने की इच्छुक खुली हुई कुछ जोड़ी बांहें दिखाई देती हैं और थकान के बावजूद मुस्कान बिखेरते कुछ होंठ दिखाई देते हैं। कुछ मुस्कानों में उपलब्धियों से उपजा आत्मविश्वास होगा, कुछ चेहरे उपलब्धियों से विरक्त क्षमायाचना की मुद्रा में। भारतीय जनता पार्टी के चेहरे कौन होंगे, इस पर कोई बड़ा संशय नहीं है। कई महत्वपूर्ण लोग संकेत दे चुके हैं कि पुराने ही ठीक हैं। कांगड़ा में शांता कुमार पर अवश्य ही फिलहाल असमंजस है। शांता कुमार ने पिछला चुनाव 'अंतिम चुनाव' कह कर लड़ा था। इस बार फिर वह पार्टी के हुक्म के इंतजार में हैं।

आम आदमी लोकतंत्र के मंदिर यानी संसद अपने सांसद के माध्यम से ही पहुंचता है। उसकी आशाएं, अपेक्षाएं और आकांक्षाएं सांसद के जरिये ही मुखर होती हैं। सांसद की चुप्पी में क्षेत्र की खामोशी बोलती है और सांसद का मुखर होना क्षेत्र का मुखर होना है। लेकिन हिमाचल के चार सांसदों में सबसे कम प्रश्न पूछने वाले सांसद शांता कुमार ही रहे हैं। उन्होंने पांच वर्ष में 1605 में से केवल 13 सवाल पूछे हैं। उन्होंने किसी चर्चा में भी भाग नहीं लिया। उसके बाद 61 सवाल पूछने वालों में हैं मंडी के रामस्वरूप जो पिछली बार वीरभद्र सिंह की पत्नी प्रतिभा सिंह को हरा कर लोकसभा पहुंचे थे। वह 20 चर्चाओं में शामिल रहे। हमीरपुर से सांसद अनुराग ठाकुर ने हिमाचली सांसदों में सबसे अधिक 455 सवाल पूछे। शिमला के सांसद वीरेंद्र कश्यप 214 सवाल ही पूछ सके। कश्यप 58 बहसों में शिरकत कर पाए। चर्चा में सबसे अधिक 77 बार हिस्सा अनुराग ठाकुर ने लिया। हाजिरी के मामले में वीरेंद्र कश्यप 331 में से 309 दिन उपस्थित रह कर सबसे आगे हैं। अनुराग ठाकुर और शांता कुमार लगभग बराबर ही उपस्थित रहे जबकि 282 के साथ सबसे कम हाजिरी राम स्वरूप की रही।

इसके बाद बात उन गांवों की जिन्हें सांसदों ने गोद लिया था। गांव गोद तो ले लिए गए लेकिन वहां बिठाए नहीं गए। गोद लेने का तात्पर्य यह था कि मां की तरह बच्चे का लालन-पालन किया जाए। हर गांव को सांसद का स्पर्श मिले, यही सोच कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 में इस योजना को शुरू किया था। योजना के उद््घाटन अवसर पर उनके भाषण के कुछ अंश यूं हैं- 'मैं मानता हूं, सांसद आदर्श ग्राम योजना एक रचनात्मक राजनीति का नया द्वार खोल रही है... मैं बताता हूं, यह काम आसान है साथियो। हमें मिजाज बदलने की आवश्यकता है। हमें जन-मन को जोडऩे की आवश्यकता है। और सांसद महोदय भी, यूं राजनीतिक गतिविधियां करते होंगे, लेकिन उस गांव में जब जाएंगे, तो कोई राजनीतिक गतिविधि नहीं। पारिवारिक संबंध, पूरा परिवार जाए, बैठे, गांव के लोगों के साथ बैठे। आप देखिए, चेतना आएगी, गांव जुड़ जाएगा। समस्याओं का समाधान हो जाएगा...।

साफ है कि प्रधानमंत्री का विजन स्पष्ट था लेकिन हिमाचल के सांसदों ने गोद लिए गांवों को कितना आदर्श बनाया? राज्यसभा सांसदों में जेपी नड्डा के गोद लिए गांव डैहर पर मेहर तो बरसी लेकिन आदर्श गांव अभी नहीं बन पाया। गांव को 24 लाख रुपये मिले हैं लेकिन अक्टूबर, नवंबर तक गांव का कचरा सतलुज में ही फेंका जा रहा था। राम स्वरूप ने पुरानी मनाली को स्ट्रीट लाइट देकर रोशन किया लेकिन और सुविधाएं नहीं दे पाए। लडभड़ोल का सिमस गांव भी आदर्श गांव से दूर है। वीरेंद्र कश्यप ने जगजीत नगर और पुरुवाला को गोद लिया था। जगजीत नगर में कई गांव अब भी बस सुविधा से वंचित हैं। पुरुवाला में तीन नवंबर तक 95 में से पांच काम ही पूरे हुए हैं। अनुराग ठाकुर ने देहलां और अणुकलां को गोद लिया था। अणुकलां में 89 में से 47 काम पूरे हुए हैं। शांता कुमार ने चंबा जिले का परछोड़ गांव लिया था। विकास कार्य शुरू तो हुए, पूरे नहीं हुए। सांसद मानते हैं कि विकास इतनी जल्द नहीं होता। ऐसी कोई खबर नहीं है कि राज्यसभा सांसद कांग्रेस के आनंद शर्मा ने कोई गांव गोद लिया हो। कांग्रेस सांसद विप्लव ठाकुर ने मसरूर गांव गोद लिया था। इस गांव से गुजरें तो आज भी लगता है कि एक ही पत्थर को काट कर बनाए गए यानी रॉक कट टेंपल वाला यह गांव कोई बच्चा है जो धौलाधार की तरफ देख कर अब भी सुबक रहा है। अब कौन सांंसद बनेगा यह मतदाता ही जानता है, लेकिन जो बने, काम की बात करे ताकि आदर्श बनने की राह देखते गांव यह न कहें :

मेरी तकदीर में मंजिल नहीं है

गुबार-ए-कारवां है और मैं हूं

Posted By: Rajesh Sharma

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